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याद-2 / वेणु गोपाल

30 bytes added, 15:30, 5 नवम्बर 2008
आप
जेल की कोठरी से
आसमान देखते हैं हरा पौधा देखते हैं उजाला देखते हैं और
बेकाबू होते
अपने आपे को भरसक काबू करते हुए नज़रें फेर लेते हैं। मैं ठीक
इसी तरह
उसकी याद करता हूँ और फिर नहीं करने की कोशिश में और-और करता हूँ। करता ही
चला जाता हूँ।
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