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प्रेयसी हो तुम! / कविता भट्ट

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ऋषिकाओं के श्रीमुख से उद्घाटित
अकाट्य सत्य है।
'''तुम मदराचल मंदराचल - समुद्र मंथन से'''
'''प्राप्त सुधा का कलश हो।'''
'''मैं याचक बनकर'''