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सारस / रसूल हम्ज़ातव

1 byte added, 14:14, 1 फ़रवरी 2024
<poem>
कभी-कभी लगता है मुझको वे सैनिक
रक्तिम युद्ध-भूमि सेलौट से लौट न जो आए,
नहीं मरे वे वहाँ, बने मानो सारस
उड़े गगन में, श्वेत पंख सब फैलाए ।
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