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04:48, 15 अगस्त 2024 {{KKGlobal}}
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|रचनाकार=राहुल शिवाय
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<poem>
हमने जो
रेखाएँ खींचीं
उसे न काटो
आधी आबादी हैं
हम पूरा जीवन हैं
हम वह कुआँ नहीं हैं
जिसके तुम ठाकुर हो
नहीं खेत हैं
जिसे जोतने को आतुर हो
सदियों की
यह दूरी
पाट सको तो पाटो
निशिगंधा ही नहीं
भोर की प्रथम किरन हैं
अधिकारों को
बंद खिड़कियाँ देने वाले
कर्तव्यों के
शिलालेख हमने रच डाले
प्यार भरे
शब्दों से
नहीं छलावे बाँटो
सकल सृष्टि में तुम हो,
हम केवल आँगन हैं
हम केवल कठपुतली ही थे,
डोर रहे तुम
रातों की संज्ञाएँ थे हम,
भोर रहे तुम
हम छाँटेंगे
या तुम ही ये
कुहरे छाँटो
नयी सुबह की आस
समय का अभिनंदन हैं
</poem>