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<poem>
रोज़ झुर्रियों को पढ़ते हैं
गाते हैं सस्वर सन्नाटे

स्मृतियों की एक बूँद से
नदी उतर आती नयनों में
रघुकुल की वह रीत कहाँ है
क्या विश्वास बचा वचनों में

सुख-सुविधाओं ने बोये हैं
कितने दुख, कितने ही घाटे

तुलसी का बबूल हो जाना
है जिसने स्वीकार कर लिया
जिसने अपनों के जीवन में
ख़ुद को ही दीवार कर लिया

वह क्या जाने कौशल्या ने
कैसे अपने दिन हैं काटे

नये समय के प्रस्तावों में
कर्तव्यों का बोध नहीं है
जननी के हिस्से जीवन है
सत्ता या प्रतिरोध नहीं है

गाँव-शहर पाटना सहज है
मन की दूरी कैसे पाटे
</poem>
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