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{{KKRachna
|रचनाकार=ल्येफ़ क्रपिवनीत्स्की
|अनुवादक=वरयाम सिंह
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<poem>
'''(एकमात्र विकल्‍प वहाँ है जहाँ मनुष्‍य के विवेक के लिए कोई विकल्‍प नहीं — ल्येफ़ शिस्‍तोफ़)'''

ध्‍यान से देखो बिना ऐनक
चौराहे के ठीक बीच में
घोर अपावनीकरण के बाद
पाखण्ड के साथ किया उच्‍च घोष
और आर्तनाद ।

निकाल फेंका बाहर ।
जो नि‍ष्क्रिय बैठे थे
लापता हो गए जीवन में ।
पर आप तो
परखना नहीं चाहते थे पास से
और उसके बिना ही
बुरी तरह प्रदूषित हो चुका था पागलपन ।

खेल रहे हैं वे
ज़मीन के नीचे क्रॉसिंग पर कहे जा रहे हैं बार-बार
यह मैं हूँ, यह मेरा सपना है… इत्‍यादि ।

निर्विवाद है यह :
पाँवों के नीचे
कर्र-कर्र की आवाज़ कर रही हैं
अकेले लोगों की दुनिया की विसंगतियाँ ।
और कुछ तथ्‍यों के सीमांत पर
नंग-धड़ंग घुस गई हैं वे एक कोण में
नि:सन्देह,
अपने किनारों के साथ ।

'''मूल रूसी से अनुवाद : वरयाम सिंह'''
</poem>
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