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{{KKRachna
|रचनाकार=अदनान कफ़ील दरवेश
|अनुवादक=
|संग्रह=
}}
{{KKCatKavita}}
<poem>
'''उन तमाम बुज़ुर्गों के नाम, जिनकी मज़ार रात के अँधेरों और दिन के उजालों में तोड़ डाली गईं'''
दरअस्ल
दिन के जबड़े में थी
आपके मज़ार की एक-एक ईंट
आसमान था हर वक़्त आपका निगहबाँ
रात ने तो, बस,
सबकुछ बराबर कर दिया
चुपचाप…
इस तलातुम में आप ख़ुदा से लौ लगाए
सोते हैं चैन की नींद !
बहुत दिन जी लिए की तरह ही
बहुत दिन मर लिए आप ऐ बुज़ुर्ग !
क़यामत का दूर-दूर तक कोई निशान नहीं
रोज़े-हश्र में अभी काफ़ी वक़्त है
उससे पहले उठें
अपने मुसलमान होने की सज़ा भुगत लें ।
</poem>
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'''उन तमाम बुज़ुर्गों के नाम, जिनकी मज़ार रात के अँधेरों और दिन के उजालों में तोड़ डाली गईं'''
दरअस्ल
दिन के जबड़े में थी
आपके मज़ार की एक-एक ईंट
आसमान था हर वक़्त आपका निगहबाँ
रात ने तो, बस,
सबकुछ बराबर कर दिया
चुपचाप…
इस तलातुम में आप ख़ुदा से लौ लगाए
सोते हैं चैन की नींद !
बहुत दिन जी लिए की तरह ही
बहुत दिन मर लिए आप ऐ बुज़ुर्ग !
क़यामत का दूर-दूर तक कोई निशान नहीं
रोज़े-हश्र में अभी काफ़ी वक़्त है
उससे पहले उठें
अपने मुसलमान होने की सज़ा भुगत लें ।
</poem>