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मेरी रूह को तख़लीक़ करके/ विनय प्रजापति 'नज़र'
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03:23, 29 दिसम्बर 2008
<poem>
मेरी रूह को तख़लीक़1 करके
किस राह में खो गये हो तुम
जिनको समेटता हूँ आठों पहर
'''शब्दार्थ : तख़लीक़=सृजित; शग़ाफ़= संध्या, Crack
'''रचनाकाल : 2004
</poem>
अनिल जनविजय
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