शोर है क्यूँ गली-गली देखो
याद और याद को भूलने भूलाने में उम्र की फ़सल फ़स्ल कट गई देखो
मार <ref>साँप</ref> कोई शिकार पर निकला
दश्त में रोशनी हुई देखो
रात की राख मुँह प' मल-मल कर
सुबह कितनी संवर सँवर गई देखो
सुबह की फ़िक़्र बाद में करना
ज़िंदगी किस तरह तुम्हारी "निज़ाम"
उलझनों से उलझ गई देखो</poem>{{KKMeaning}}