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[[Category:ग़ज़ल]]
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क्या रुख़्सत-ए-यार की घड़ी थी
हँसती हुई रात रो पड़ी थी
हम ख़ुद ही हुए तबाह वरना
दुनिया को हमारी क्या पड़ी थी
क्या रुख़्सत-ए-यार ये ज़ख़्म हैं उन दिनों की घड़ी थी<br>यादेंहँसती हुई रात रो पड़ी जब आप से दोस्ती बड़ी थी<br><br>
हम ख़ुद ही हुए तबाह वरना<br>दुनिया जाते तो किधर को हमारी क्या तेरे वहशीज़न्जीर-ए-जुनूँ कड़ी पड़ी थी<br><br>
ये ज़ख़्म हैं उन दिनों की यादें<br>जब आप से दोस्ती बड़ी थी<br><br> जाते तो किधर को तेरे वहशी<br>ज़न्जीर-ए-जुनूँ कड़ी पड़ी थी<br><br> ग़म थे कि "फ़राज़" आँधियाँ थी<br>दिल था कि "फ़राज़" पन्खुदई थी<br><br/poem>