|रचनाकार=अहमद फ़राज़
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छेड़े मैनें कभी लब-ओ-रुख़्सार के क़िस्से
गहे गुल-ओ-बुलबुल की हिकायत को निखारा
गहे किसी शहज़ादे के अफ़्साने सुनाये
गहे क्या दुनिया-ए-परिस्ताँ का नज़ारा
मैं खोया रहा जिन-ओ-मलैक के जहाँ में
हर लहजा अगर्चे मुझे आदम ने पुकारा
छेड़े मैनें कभी लबबरसों यूँ ही दिलजमी-ओए-रुख़्सार के क़िस्से <br>गहे गुल-ओ-बुलबुल औरंग की हिकायत को निखारा <br>ख़ातिर गहे किसी शहज़ादे के अफ़्साने सुनाये <br>सौ फूल खिलाये कभी सौ ज़ख़्म ख़रीदे गहे क्या दुनिया-ए-परिस्ताँ का नज़ारा <br>मैं लिखता रहा हिज्ब बग़ावत मन्शूं की मैं खोया पढ़ता रहा जिनक़स्र-ओ-मलैक नशीनों के जहाँ क़सीदे उभरा भी अगर दिल में <br>कोई जज़बा-ए-सरकश हर लहजा अगर्चे मुझे आदम ने पुकारा <br><br>इस ख़ौफ़ से चुप था के कोई होंठ न सी दे
बरसों यूँ ही दिलजमीलेकिन ये तिलिस्मात भी ता-एदेर न रह पाये आख़िर मै-औरंग की ख़ातिर <br>सौ फूल खिलाये कभी सौ ज़ख़्म ख़रीदे <br>ओ-मीना-ओ-डफ़-ओ-चंग भी टूटते मैं लिखता रहा हिज्ब बग़ावत मन्शूं की <br>मैं पढ़ता रहा क़स्रयूँ दस्त-नशीनों के क़सीदे <br>ओ-गरेबाँ हुआ इन्सान-ओ-ख़ुदाबन्द उभरा भी अगर दिल में कोई जज़बानखचीर तो तड़पे क़फ़स-ए-सरकश <br>रंग भी टूटे इस ख़ौफ़ से चुप था के कोई होंठ न सी दे <br><br>कश्मकश-ए-ज़र्रा-ओ-अंजुम की फ़िज़ा मेंकशकोल तो क्या अफ़्सर-ओ-औरंग भी टूटे
लेकिन ये तिलिस्मात भी ता-देर न रह पाये <br>मैं देख रहा था मेरे यारों ने बढ़कर आख़िर मै-ओ-मीना-ओ-डफ़-ओ-चंग भी टूटते <br>क़ातिल को पुकारा कभी मक़्तल को सदा दी यूँ दस्तगहे रस्न-ओ-गरेबाँ हुआ इन्सान-ओ-ख़ुदाबन्द <br>दार के आग़ोश में झूले नखचीर तो तड़पे क़फ़स-ए-रंग भी टूटे <br>इस कश्मकश-ए-ज़र्रागहे हरम-ओ-अंजुम दैर की फ़िज़ा में<br> बुनियाद हिला दी जिस आग से भरपूर था माहौल का सीना कशकोल तो क्या अफ़्सरवो आग मेरे लौह-ओ-औरंग क़लम को भी टूटे <br><br>पिला दी
मैं देख रहा था मेरे यारों ने बढ़कर <br>क़ातिल को पुकारा कभी मक़्तल को सदा दी <br>गहे रस्न-ओ-दार के आग़ोश में झूले <br>गहे हरम-ओ-दैर की बुनियाद हिला दी <br>जिस आग से भरपूर था माहौल का सीना <br>वो आग मेरे लौह-ओ-क़लम को भी पिला दी <br><br> और आज शिकस्ता हुआ हर तौक़-ए-तलाई <br>अब फ़न मेरा दरबार की जगीर नहीं है <br>अब मेरा हुनर है मेरे जमहूर की दौलत <br>अब मेरा जुनूँ कैफ़-ए-ताज़ीर नहीं है <br>अब दिल पे जो गुज़रेगी बे-टोक कहूँगा <br>अब मेरे क़लम में कोई ज़ंज़ीर नहीं है <br><br/poem>