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Kavita Kosh से
१.
नाहक़<ref>व्यर्थ </ref> हम मजबूरों पर यह तुहमत<ref>आरोप</ref>है मुख़्तारी<ref>स्वतन्त्रतापूर्वक कार्य करने की </ref> की
२.
दिल वो नगर नहीं कि फिर आबाद हो सके
</poem>
{{KKMeaning}}