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पलट के देखना चाहा कि ख़ुद ग़ुबार<ref>धूल</ref>हुए
ये इंतकाम <ref>बदला</ref>भी लेना था ज़िन्दगी को अभीजो लोग दुश्मने-जाँ <ref>जानी-दुश्मन</ref>थे वो ग़मगुसार <ref>ढाढस बँधाने वाले</ref>हुए
हज़ार बार किया तर्क़े-दोस्ती<ref>मित्रता तोड़ना</ref>का ख़याल<ref>विचार</ref>