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बारूद और बच्चे / मनोज श्रीवास्तव
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09:39, 10 जून 2010
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'''बारूद और बच्चे'''
ममता से वंचित-शापित
माँओं के ख्यालों में
भविष्य के अंध कूप में
बारूदी ज़खीरा इकट्ठा कर रहे हैं ।
(वर्तमान साहित्य, सं. कुंवर पाल सिंह, अक्टूबर, 2009)
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Dr. Manoj Srivastav
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