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'''बारूद और बच्चे'''
 
ममता से वंचित-शापित
माँओं के ख्यालों में
भविष्य के अंध कूप में
बारूदी ज़खीरा इकट्ठा कर रहे हैं ।
 
(वर्तमान साहित्य, सं. कुंवर पाल सिंह, अक्टूबर, 2009)
 
 
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