भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

Changes

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज
मदरसे औ' मन्दिर भी बाज़ार निकले
किसी एक विरान वीरान-सी रहगुज़र पर
फटे हाल मुफलिस वफादार निकले
गुलाबों कि की दुनिया बसाने की क्वाहिशख़्वाहिश
लिए दिल में जंगल से हर बार निकले
</poem>