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{{KKGlobal}}
{{KKRachna}}| रचनाकार=सर्वत एम जमाल संग्रह= }} {{KKCatGhazalKKCatGazal}} <poem>खून में अपने ही नहलाया गया फिर मुझे सिक्कों में तुलवाया गया
जिस बगावत की खबर थी शहर को इक तमाशा था यहाँ आया गया  लोग शर्मिन्दा थे जिस इतिहास परहर गली कूचे में दुहराया गया  जाने क्या साजिश रची मेमार नेजंगलों को शहर बतलाया गया आने वाली थी सवारी शाह कीखून से रस्तों को धुलवाया गया चंद लोगों की खुशी के वास्तेआदमी को भीड़ लिखवाया गया तूं बहुत खुद्दार था सर्वत मगरहाथ फैलाए हुए पाया गया</poem>