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.........................मुकम्मिल गांरटी, देश भर में 2001 सर्विसिंग सेंटर्स ......
कामिनी ! लोगी यह शब्दबीज
</poem>'''7‘शब्दों की यह खेती तुम्हें ही मुबारक।पंचमेल ध्वनियां नहीं कहलाती नाद-ब्रह्मशब्दों के शिल्पी !पहले अ-शब्दों की दुनिया में आओसमझ पाओगे तभी शब्दों का सच्चा मर्मराहुल, तुम धरती बनो जल बनो आग बनो...............................अ-राहुल बनो तुमशब्दों की गुफा तुम्हंे अपनी कैद में रखकभी नहीं प्रकट होने देंगी तुम परगुफा का रहस्यशब्दों का तिलिस्मतोड़ सकता है सिर्फ अ-शब्द !और शब्द ही अमूर्त होकर बनता है अ-शब्दजैसे गति अमूर्त होकर बन जाती है नित्यमूर्त शब्दों की जिन्दगी चाहते हो तो साधना करो अमूर्त बनने कीसचकितना सहज है मूर्त बनकरअपनी-अपनी मांदों में दुबके रहनाऐंठना@अपने सब्जबाग में इठलाना इतराना ईष्र्या करनाऔर कितना कठिन हैअमूर्त होकर सबमें समा जाना प्यार बन जानादिव्य ध्वनियों को शब्दों मंे तराशता है आदमीऔर इन शब्दों को ढ़ोनाउसकी नियति है शब्दधारी प्राणी वहशब्दों के कचरे से, टूटे-फूटे शब्दों से शब्दबाग बनानाजानता है वह नेकचन्द के रॉक गार्डेन की तरहदेखना चाहो तो देख सकते हो तुममिसीसिपी, वोल्गा, अमेजन, गंगा, यांगत्सी, मेकंग की घाटियों मेंसुन्दर सजे-संवरे इन शब्दबागों कोसदियों से फेंके गये शब्दों, शब्द महलों के भग्नावशेषोंशब्द-तिनकों और टुकड़ों से जोड़-जाड़करबनायी गयी हैं ये सुन्दर आकृतियाँ ये शब्द-पेड़ ये शब्द-खेत ये शब्द झरने ........................ये शब्द-गुलाब ये शब्द सीढ़ियाँ ये शब्द मूर्तियाँ............ये शब्द हाइट हाउस ये शब्द-क्रेमलिन ये शब्द-निषिद्ध नगर ...............ये शब्द-जगन्नाथ ये शब्द-मक्का ये शब्द सलीब..................लेकिन मेरे प्रियतमतुम इन अद्भुत शब्द-बागों मेंखो मत जानाजब लोग शब्दों से ही शब्दों को तराशने लगेंतब तुम उन्हेंस्रोत कीनिःशब्द दिव्य ध्वनियों की याद दिलानाशब्दों से कहनाउनकी आहुति का समय आ गया हैकि उन्हे नया शब्द संसार रचना हैअपनी हवि देखकर माँ की तरहइस शब्दमेध यज्ञ में इन शब्दों की हवि देते समय कहना -शब्द ऊर्जा !तुम हमारी निःशब्द वाणी में, हमारे निःशब्द कर्म मेंनये शब्दों के रूप में अंकुरित होओबनो एक नया संवाद@ एक नया सेतु '''8एक पगडंडी अनन्तआसपास बिखरे कनेर के फूलएक नदी पहाड़ी@एक पुल@एक सुबहएक उष्ण@मादक सुगंध @आम के बौरों कीएक हल्का झोंका हवा का@पीली मिट्टी@हरी घास का मैदानबच्चे@टिकुलियाँ चुनती लड़कियाँएक तरंग - शायद विद्युत्चुम्बकीयइस एक की कगार पर खड़ा एक मैंसफर के अन्त मेंदेखता हूँ सामने एक नया ब्रह्माण्डमेरी मृत्यु तुम किसका जीवन होमेरी संध्या तुम किसकी उषा होमेरे अन्त तुम किसका प्रारम्भ हो ?अलविदा..........................स्वागतम् (फरवरी, 1989)
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