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भाई - बहन / गोपाल सिंह नेपाली

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{{KKGlobal}}{{KKRachna|रचनाकार=गोपाल सिंह नेपाली}}{{KKCatKavita‎}}<poem>तू चिंगारी बनकर उड़ री ,जाग -जाग मैं ज्वाल बनूँ ,तू बन जा हहराती गँगा, मैं झेलम बेहाल बनूँ,आज बसन्ती चोला तेरा, मैं भी सज लूँ लाल बनूँ,तू भगिनी बन क्रान्ति कराली, मैं भाई विकराल बनूँ,यहाँ न कोई राधारानी, वृन्दावन, बंशीवाला,...तू आँगन की ज्योति बहन री, मैं घर का पहरे वाला ।
बहन प्रेम का पुतला हूँ मैं, तू बन जा हहराती गंगा ममता की गोद बनी,मेरा जीवन क्रीड़ा-कौतुक तू प्रत्यक्ष प्रमोद भरी,मैं झेलम बेहाल बनूँ भाई फूलों में भूला, मेरी बहन विनोद बनी,भाई की गति, मति भगिनी की दोनों मंगल-मोद बनीयह अपराध कलंक सुशीले, सारे फूल जला देना ।जननी की जंजीर बज रही,चल तबियत बहला देना ।
आज बसन्ती चोला तेरा ,मैं भी सज लूं लाल बनूँ , तू भगिनी बन क्रान्ति कराली ,मैं भाई विकराल बनूँ , यहाँ न कोई राधारानी ,वृन्दावन ,बंशीवाला , ...तू आँगन की ज्योति बहन री ,मैं घर का पहरे वाला । बहन प्रेम का पुतला हूँ मैं ,तू ममता की गोद बनी , मेरा जीवन क्रीडा -कौतुक तू प्रत्यक्ष प्रमोद भरी , मैं भाई फूलों में भूला ,मेरी बहन विनोद बनी , भाई की गति ,मति भगिनी की दोनों मंगल -मोद बनी यह अपराध कलंक सुशीले ,सारे फूल जला देना । जननी की जंजीर बज रही ,चल तबियत बहला देना । भाई एक लहर बन आया ,बहन नदी की धारा है , संगम है ,गंगा गँगा उमड़ी है ,डूबा कूल -किनारा है , यह उन्माद ,बहन को अपना भाई एक सहारा है , यह अलमस्ती ,एक बहन ही भाई का ध्रुवतारा है , पागल घडी ,बहन -भाई है ,वह आजाद आज़ाद तराना है । मुसीबतों से ,बलिदानों से ,पत्थर को समझाना है.</poem>
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