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{{KKGlobal}}{{KKRachna|रचनाकार=गोपाल सिंह नेपाली}}{{KKCatKavita}}<poem>तू चिंगारी बनकर उड़ री ,जाग -जाग मैं ज्वाल बनूँ ,तू बन जा हहराती गँगा, मैं झेलम बेहाल बनूँ,आज बसन्ती चोला तेरा, मैं भी सज लूँ लाल बनूँ,तू भगिनी बन क्रान्ति कराली, मैं भाई विकराल बनूँ,यहाँ न कोई राधारानी, वृन्दावन, बंशीवाला,...तू आँगन की ज्योति बहन री, मैं घर का पहरे वाला ।
बहन प्रेम का पुतला हूँ मैं, तू बन जा हहराती गंगा ममता की गोद बनी,मेरा जीवन क्रीड़ा-कौतुक तू प्रत्यक्ष प्रमोद भरी,मैं झेलम बेहाल बनूँ भाई फूलों में भूला, मेरी बहन विनोद बनी,भाई की गति, मति भगिनी की दोनों मंगल-मोद बनीयह अपराध कलंक सुशीले, सारे फूल जला देना ।जननी की जंजीर बज रही,चल तबियत बहला देना ।