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वो मौज-ए-हवा जो अभी बहने की नहीं है / कबीर अजमल

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वो मौज-ए-हवा जो अभी बहने की नहीं है
हम जानते हैं आप से कहने की नहीं है

यूँ खुश न हो ऐ शहर-ए-निगाराँ के दर ओ बाम
ये वादी-ए-सफ्फाक भी रहने की नहीं है

ऐ काश कोई कोह-ए-निदा ही से पुकारे
दीवार-ए-सुकूत आप ही ढहने की नहीं है

क्यूँ अक्स-ए-गुरेजाँ से चमक बुझ गई दिल की
ये रात तो महताब के गहने की नहीं है

रक्कासा-ए-सहरा-ए-जुनूँ भी है यह मौज
यह चश्म-ए-खूँ-नाब से बहने की नहीं है

इक तरफ तमाशा है मुझे शोखी-ए-गुफ्तार
आशुफ्तगी-ए-‘मीर’ भी सहने की नहीं है