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शबों के हाथ में खंज़र थमा गया कोई / विनय कुमार

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शबों के हाथ में खंज़र थमा गया कोई।
हमारे क़त्ल को आसाँ बना गया कोई।

तबील धूप में पागल हवा के जंगल में
मुझे चिराग़ सा हँसकर जला गया कोई।

गिरा के सख्त दिनों के छ्टे हुए लम्हे
मेरे वज़ूद का पानी हिला गया कोई।

तमाम बाग धुएं कि गिरफ़्त में फ़िऱ है
गुज़ष्ता रात में क्या गुल खिला गया कोई।

शहर के जिस्म में खाली जगह नहीं दिखती
शहर के बीच से उठकर चला गया कोई।

मुझे पता है मगर राज़दां नहीं हूँ मैं
किसी का राज़ था आकर बता गया कोई।