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शब्द तो कुली है / सरोज कुमार

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हर बीस कोस पर
बदल जाती है भाषा,
इधर, हर चौबीस घंटे में
बदल जाते हैं विचार!
ऐबों की तरह भाने लगते हैं
नए तर्क!
धीरे-धीरे ऐसा बदला जाता हूँ
कि जो था
सोच नहीं पाता, ,कि वो था!

क्या विचार को पकड़कर
बैठ जाऊँ?
जहाज का लंगर बनकर
इठलाऊँ?
दाद नहीं मिलती विचार-
परायण को,
जहाज को क्यों न छोड़ दूँ
समुंदर में
विजय यात्रा के प्रयाण में?

शब्द तो कुली हैं विचारों के
कुलियों के मुँह, मैं क्यों लगूँ
कुलियों के पारिवारिक झगड़े
मैं क्यों लड़ूँ?
कुली को भी क्यों लेना चाहिए
मेरी यात्रा में रुचि?
क्यों पड़ना चाहिए फर्क
कि वो मेरी पेटी लादे है
या होल्डाल!

और यह भी मेरी चिंता है
कि मेरी पेटी में
क्या-क्या बंद है
और होल्डाल में
क्या बंधा है?