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शम्बूक का शाप / रवीन्द्र भारती

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मर्यादा पुरुषोत्तम राम!
त्रेता में निर्दोष तपस्वी शम्बूक का
अकारण वध करके तुम्हें क्या मिला?
आज कलियुग में उसी अभिशाप से
सैकड़ों शम्बूक और सहस्रों एकलव्य
नर्मदा-ताप्ती की घाटियों
और विंध्य-सतपुड़ा की गुफ़ाओं में / निरन्तर तपस्यारत हैं
सहस्त्राब्दियों पूर्व रेवा तट पर
अकारण बहाया गया अनार्यों का लहू
आज पूरे हिन्दू समाज से / प्रतिशोध के लिए बेचैन है
और सुनो! ये आरक्षण की आग भी
मैंने ही लगायी है
जब तक तुम्हारा नपुंसक हिन्दू समाज
निर्दोष हरिजनों और मूक गिरिजनों के
बूढ़ों-बच्चों और महिलाओं को / यूँ ही ज़िन्दा जलाता रहेगा
याद रखना मुझ तपस्वी शम्बूक का
रक्तिम अभिशाप रंग लाता रहेगा
यूँ ही ख़ून के बदले—
ख़ून बहता रहेगा।