भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

शरशय्या / तेसर सर्ग / भाग 19 / बुद्धिधारी सिंह 'रमाकर'

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

कला सरस पद गाँथए दाम।
दए न सकए धन समुचित दाम।।117।।
कवि विज्ञानक साधक देव।
कहबै छथि ज्ञानी भूदेव।।118।।

नव विज्ञानक बाड़ी साजि।
जन मन हर्षित कबिता राजि।।119।।
करए अहँक भूमक विन्यास।
भरत भुवन भावन अविनाश।।120।।

सूनल एहि विधि वाणी अनुपम
भावी विश्वनिमित्त।
संगहिं ब्रह्मानन्दक रसमे
बहल सदस्यक चित्त।।121।।

तत समवेत सुधी शुभविंचन
सुधाघारसँस भेल।
पीवि पिआसल पुट पीयूषक
पूरित मन भए गेल।।122।।