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शरशय्या / दोसर सर्ग / भाग 17 / बुद्धिधारी सिंह 'रमाकर'

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सज्जन जीवन यापन हेतुक
देखि धिपाओल ललका मोहर।
याबत करगत करितहु ताबत,
छूटल करसँ भेलहुँ निठोहर।।101।।

महाकल घए गगन-रूपके
व्योमवारुणी शिरपर धारल।
शोभि रहल की गौरी भालहिं
चकमक ललका टिकुली साटल।।102।।

कए अनुम न समय हरनृत्यक
चाँकि गेली गिरिजा भए कम्पित।
खसल अचानक शिरसँ बिन्दी
करइत जन-मन एखन अचम्भित।।103।।

बेला नीरब शान्तिमय
देखइत प्रति दिन काल।
आवथि मुनिगण सरसजन
सभ दिन सन्ध्याकाल।।104।।

अति प्रशस्त ई समय थिक
जानथि सुधौसमाज।
पाबए हेतुक ज्ञानके
आवथि भीष्मसमाज।।105।।

अद्वितीय प्रतिभा जनिक
त्याग जनिक जग जान।
तनि सुश्रुषा करथि जन
पएबा हेतुक ज्ञान।।106।।