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शरशय्या / दोसर सर्ग / भाग 3 / बुद्धिधारी सिंह 'रमाकर'

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क्रन्दन पूर-तरंग-त्रिपथगा
सुतमणि सन्निधि पाबि।
प्रणव उचरि प्रभु! कमल
धएलन्हि मनमे भावि।10।।

तातक जीवन जीवन अभिनयक
भेल यवनिका पात।
राज्यहीन कर्त्ता ततए
नायक जत अवदात।।11।।

भीष्मक नोर ओर नहि छोड़ए
यद्यपि पुरुष प्रवीर।
पितृ हीन तन लोचन उमड़ल
कनइत माइक नीर।।12।।

पितृ-लालनक अवसर बीतल
पबिए कतए दुलार।
सद्यःआबि पड़ल अछि सम्भ्रम
गुरुतर कमक भार।।13।।

एक एक कए गुण सभ स्मृति-
पट्टहिं अंकित भेल।
शेष विश्वके खेबए कोन विधि
चित्त सशंकित भेल।।14।।