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शर्मिंदा राष्ट्र की ओर से प्रतिक्रिया / चिराग़ जैन

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लो ख़त्म हुई आपाधापी, लो बंद हुई मारामारी
लो जीत गई सत्ता फिर से, लो हार गई फिर लाचारी
कल सात समंदर पार कहीं इक आह उठी थी दर्द भरी
तब से जनता है ख़फ़ा-ख़फ़ा, तब से सत्ता है डरी-डरी
सोचो अंतिम पल में उसका कैसा व्यवहार रहा होगा
नयनों में पीर रही होगी, लब पर धिक्कार रहा होगा
जब सुबह हुई तो ये दीखा, बस ग़ैरत के परखच्चे हैं
इक ओर अकड़ता शासन है, इक ओर बिलखते बच्चे है
जनता के आँसू मांग रहे, पीड़ा को कम होने तो दो
तुम और नहीं कुछ दे सकते, हमको मिलकर रोने तो दो
सड़कों की नाकाबंदी करके, ढोंग रचाते फिरते हो
अभिमन्यु की हत्या करके, अब शोक जताते फिरते हो
जो शासक अपनी जनता की रक्षा को है तैयार नहीं
उसको शासक कहलाने का, रत्ती भर भी अधिकार नही।