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शव-3 / समीर बरन नन्दी

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बचपन की छाया की तरह
पड़ा रहता है शव
पहले प्यार की तरह
जागा रहता है शव ।

जैसे गुफ़ा में रहता है अँधेरा
चित्र-लिपि-सा हाड़ पर रहता है उकेरा
जैसे आदर्श से ढका रहता है
नेता का चेहरा ।

दुधमुँहे बच्चे में जैसे
रिश्तो का बीज छुपा होता है
शव के लिए देह को
बचा कर रखना होता है ।