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शाम-ए-फ़िराक़ आज भी सोहबत वही मिली / रवि सिन्हा

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शाम-ए-फ़िराक़[1] आज भी सोहबत वही मिली
ख़ल्वत[2] में फिर से आप की मौजूदगी मिली

दस्तक हुई है दर पे तसव्वुर के बार-बार
तहत-ए-शु'ऊर[3] कोई कहानी दबी मिली

पहुँचे ख़याल-ए-हुस्न से हुस्न-ए-ख़याल तक
दरिया की थी तलाश हमें तिश्नगी[4] मिली

आहट हुई थी आप की मुद्दत के बाद आज
ठिठकी हुई सी दर पे खड़ी ज़िन्दगी मिली

ख़िलक़त[5] को क्या मिले कि उसे आगही[6] मिले
मिट्टी को क्या मिला तो मुझे आगही मिली

सूरज-मुखी फ़रेफ़्ता[7] सूरज ग़ुरूर में
आलम के हर अज़ीम[8] को कैसी ख़ुदी मिली

उतरा है ख़ुद के पार समन्दर हज़ार बार
दुनिया हरेक बार कोई और ही मिली

शब्दार्थ
  1. जुदाई की शाम (evening of separation)
  2. अकेलापन (solitude)
  3. अवचेतन (subconscious)
  4. प्यास (thirst)
  5. जनता, सृष्टि (people, creation)
  6. चेतना (awareness)
  7. मुग्ध ( charmed, infatuated)
  8. महान (great)