शिला का खून पीती थी
वह जड़
जो कि पत्थर थी स्वयं।
सीढ़ियाँ थीं बादलों की झूलतीं
टहनियों-सी।
और वह पक्का चबूतरा,
ढाल में चिकना:
सुतल था
आत्मा के कल्पतरु का?
शिला का खून पीती थी
वह जड़
जो कि पत्थर थी स्वयं।
सीढ़ियाँ थीं बादलों की झूलतीं
टहनियों-सी।
और वह पक्का चबूतरा,
ढाल में चिकना:
सुतल था
आत्मा के कल्पतरु का?