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शीतल साठे के लिए / कर्मानंद आर्य

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ये जो आँखे हैं तुम्हारी
तकलीफ की उतरन, दुःख का दरिआव
उन अनंत आँखों में एक अनंत आँख झांक रही है

अनंत दुःख, अनंत काल
जाति की तरह विरासत में मिला है अन्याय

मैं हिंदी भाषी, तुम्हारी मराठी में समझ रहा हूँ
नहीं, नहीं समझने की भाषा एक ही है
अनंत दुःख, अनंत काल

जंगल डर गया है
लगता है तुम्हारी आवाज में छुपी है बंदूख की आवाज
अबकी बार आवाज उन्हें भी सुनाई दी है
जो कमजोर हैं, जो बहरे अंधे गूंगे हैं

तुम्हारी आवाज दब नहीं सकती
क्योंकि तुम चिल्ला नहीं रही हो, गा रही हो गीत
मुर्दा लोगों के भीतर, गाने की आवाज जिन्दा रहती है

इतिहास गवाह है जब ऐसी आवाजों का दम घुटा है
देश मर गया है या हुई है क्रांति
तुम्हारी आवाज क्रांति की पहली किताब बन गई है

तुम्हारी आवाज बन गई है भीड़
पत्थर बन गई है तुम्हारी आवाज
हर हृदयहीन वक्ष में तुम्हारी आवाज रक्खा हुआ लोहा है

तुम डफली लिए चौराहे पर खड़ी हो
हर बोर्ड पर लिखा है तुम्हारा नाम
हर बूढी माँ, दो बिछड़ी सहेलियां
खेत से आते किसान, गुजरते ट्राम
मकान, दुकान, आसमान

एक अनंत गुलाम लोग
तुम्हें जेल की दीवारों से मुक्त कर रहे हैं