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सच्चिदानन्द लहरी / शशीधर

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(१)
गुरु शब्द
ॐ आदिगुरु सत् ।
ॐ अनादिगुरु सत् ।
ॐ आपे भगवान् सच्चिदानन्द सत् ।
जेते राम भगत हो गए सत् ।
उनके कृपायैं रहबल सत् ।

गुरु शब्द सच्चिदानन्द लहरी आत्मा मै कहि जाऊँ ।।
बैराग विवेक गोविन्द फेरि फेरि गाऊँ ।।१।।
पहिले गुरु मेरा माता पिता ।।
दोसरा गुरु जीन करम दिये यज्ञोपवीता ।।२।।
तेसरे गुरु मेरे सास्त्र सतसङ्गत वताई ।।
चौथे गुरु मेरे सत्य तारक जीन मरीनाम सुनाई ।।३।।
पाँच हूँ गुरु मेरे बुध्दि सत असत जाँची ।।
छैटे गुरु सत सङ्गत सत्य मार्ग बताय भ्रमसैं बाँची ।।४।।
सात हुँ गुरु मेरे माहाँ वैराग उबजी सभ मिख्या देषाई ।।
आठ हुँ गुरु मेरे ब्रह्मज्ञान आदिरुप ब्रह्म चिन्हाई ।।५।।
नम हुँ गुरु मेरे झुसिल् किरा ।।
दृढ तप करि तन बदले अति धीरा ।।६।।
ओहि तन बदलि पुतली होई उडी जाई ।।
यहि चरित्र देषि मेरे परतीत आई ।।७।।
दशहुँ गुरु मेरे आदि पुरुष आदि विराट लिंग ।।
दसे दिसाके तेज येक होइ उठै अनेक तरंग ।।८।।
ओहि तेजसै वायु बहे वहिसे रंगी विरंगी मेघमण्डल उपजी ।।
वोहिसे अनेक रंग बरसे सकल ज्योनी होवे महावीर जोधा गरजी ।।९।।
यही लीला देवी विराटकी प्रमाण करिके हामु चीरज होई ।।
यही सुक्षम विराट वहि साहेबका समाध जोरै ‌ऐसे तेज होवै सोई ।।१०।।
एकादश गुरु मेरे शिव स्वामी ।।
घटहिया योग बतावै सर्वत्र गामी ।।११।।
येकाइस गुरुके चरणारविंदमे दास शशिधरको नित्य प्रणाम ।।
तुमरे कृपासे योग धारण किये नित्त युगत लिउँ सत्यनाम ।।१२।।
मे। मत भवसागर ठहरायेयेही कलेवर ।।
पोषन रावन खातीर संका उपजै अनेक सरदर ।।१३।।
यहि संका मेटि जब असंखा हाई ।।
तब होवै सांख्य योगी सोई ।।१४।।
यहि निरगुन अनुराग ताल छन्द नाहीं भाई ।।
जे विधि राम चरण प्रेम बाढै ते विधि गाई ।।१५।।
बिना गाये योग युगती नहि आई ।।
गगननाद फेरी यक चित्तलाई ।।१६।।
काव्य व्याकर्ण भाषा स्नानी अक्षर निकरी आई ।।
केते श्लोकपद कंठ भाषै हरि गत नही पाई ।।१७।।
सुनी देषि चाल चाल काया कर रत (न भीति ? ) ।।
युगल भगत नहि लागे स्थानी सोभाव न जीती ।।१८।।
नाद अनुराग अथानी भाषा उचा सब्‌द गाई ।।
मिले पुरुष परमानन्द अट्ट्मा अलष जगाई ।।१९।।

दोह
छलकपट छोडि गुरु करे गुरु है वहि आदिरुप ।
गुरु ब्रह्मा औतार है गुण गुरु अगुण ब्रह्मा अनूप ।।१।।
बाह्रवरस पंथा चलन सहज है जनमभर फिरे हो (को) ई ।
ईतो दृढासन बैठि अगमपन्थ गमकरी जावै विरला कोई ।।२।।
इति गुरु शब्द ।।१।।

(२)
भक्ति शब्द

भक्ति शब्द कही जाउँ ।।
पहीले लिउँ गुरुके नाउँ ।।१।।
सत्यवचन अधीन गुरुके नाम गाई ।।
मन गदगद तन पुलकावली रामनाम समाई ।।२।।
तुमहि साहेब सतगुरु दिनदयाला ।।
तुमहि साहेब सतगुरु परमानन्द कृपाला ।।१।।
तुमहि साहेब सतगुरु मेरे मातापिता हामु तुमरे बालकु ।।
तुमहि पढाउ चिह्राउ निरमल होइ दिनदिन झलकुँ ।।२।।
येकु विनती मेरे स्वामी कर जोरी ठाडरहु तुमहरे आगु ।।
गहिरा गमीरा अपार सागर के विधि पार लागुँ ।।३।।
जे विधि माता पिता आफ्नु बाला सघाई ।।
तब बाला समरथ होवै वही चाल चलाई ।।४।।
ते विधि चेताउ सघाउ समरथ कराइ देउ ।।
जब समरथ होइहुँ नित्त करिहुँउ सेउ ।।५।।
काँहाँ आदि मध्य काँहाँ छेउ ।।
जाँहाँ ताँहाँ तुमहुँ खेलै दोसरा न देउ ।।६।।
घटहिमें ढोडूँ घटहीमें धिरज धारुँ ।।
घटहीमा गाउँ थ्याउँ घटहीमा समाध जोरुँ ।।७।।
तुमही साहेब पार अपार तुमहि निरंकार ।।
तुमही साहेब आदि अनादि तुमही निराधार ।।८।।
तुमही साहेब नाथ आफै नाथी ।।
तुमही साहेब षेल षेलावै आफै साथी ।।९।।
तुमही साहेब मेरे घट बोले आपे समाई ।।१०।।
केतने थाया मेरे चित्त नहीं आए स्वामी ।।
तुमही आपे आफ अन्तरज्यामी ।।११।।
तुमही तरी हो गोसाँई तुमही तार ।।
तुँ सदा सनातन निरंकार ।।१२।।

दोहा
कौडीसरी अक्षर है लाष करोड जाँहाँ सें आए वेद ।।
अमोल अर्थ जो बुझी समावै पावै अण्डपिण्डको भेद ।।१।।
पारखि बिना हीरा को पैचानै कौडीसरी तौन बिकाई ।।
सज्जनबिना ज्ञान को बुझै मारग छोडी वहै मती इराई ।।२।।
कौडी कौडी सौदा जौरै तब लषपती होवै हीरा पाई ।।
ते विधिशब्द युगत जोरै चुकै नाही लाला पाई ।।३।।
इति भक्ति शब्द ।।२।।

(३)
विनती शब्द (वा अधीन शब्द)

अधीन शब्द कही जाउ ।।
मै गरिब काँहाँले बताउँ ।।१।।