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सच तो ये है के तमन्नओं की जाँ होती है / महेश चंद्र 'नक्श'

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सच तो ये है के तमन्नओं की जाँ होती है
वही इक बात जो हैरत में निहाँ होती है

हाल कह देते हैं नाज़ुक से इशारे अक्सर
कितनी ख़ामोश निगाहों की ज़बाँ होती है

मेरे एहसास ओ तफ़क्कुर में सुलगती है जो आग
वही मज़लूम के अश्कों में निहाँ होती है

हाए वो वक़्त के जब उन की हसीं आँखों से
एक पुर-कैफ़ तजल्ली सी अयाँ होती है

लोग कहते हैं जिसे हुस्न-ए-अदा की शोख़ी
यही रंगीन इशारों की बयाँ होती है

कितनी प्यारी है वो मासूम तम्न्ना ऐ दोस्त
जो तज़बज़ुब की फ़जाओं में जवाँ होती है