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सनोबर / मिख़ाइल लेरमन्तफ़ / मदनलाल मधु

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वीराने उत्तर में खड़ा हुआ एकाकी
       नग्न शृंग पर एक सनोबर,
ऊँघा करता, हिलता-डुलता, श्वेत बर्फ़ का
       पहने हुए अनूठा बकतर।

और देखता सपनों मेंवह दूर मरुस्थल
       वहाँ, जहाँ से सूर्य निकलता,
एक उदास ताड़ भी सुन्दर बढ़ता जाता
उस टीले पर कड़ी धूप में जो नित जलता।

1841
मूल रूसी से अनुवाद : मदनलाल मधु

और अब यह कविता मूल रूसी भाषा में पढ़ें

                    Сосна

На севере диком стоит одиноко
      На голой вершине сосна
И дремлет качаясь, и снегом сыпучим
      Одета как ризой она.

И снится ей всё, что в пустыне далекой –
      В том крае, где солнца восход,
Одна и грустна на утесе горючем
      Прекрасная пальма растет.

1841