भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

सप्तम उमंग / रसरंग / ग्वाल

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

नाकय लक्षण (दोहा)

चतुर कुलीन गुनी धनी, जुत पुरुषत्व उदार।
सुभग जु बीर छमी बली, नायक ताहि उचार॥1॥

नायक जाति

नायक हू चौ जाति के, इक पंचाल बखान।
दत्त कुचमार जो कहौं, बहुरि भद्र पहचान॥2॥
पदमिनि आदिक चिन्ह सम, चिन्ह उच्च जिय मान।
और सबै लक्षन वही, क्रम तें करौं बखान॥3॥

कर्मप्रधान नायक

प्रथमहि पति, उपपति बहुरि, बैसिक फेरि लखात।
नायक कर्मप्रधान ये, बरनत बिदुष सिहात॥4॥

पति लक्षण

भाँवरि दै श्रुति-रीति तें, ब्याह लेय जो तीय।
सो पति ग्रंथन के बिषै, सुकबिन ने बरनीय॥5॥

स्वभावानुसार पतिभेद

पति चौबिधि अनुकूल इक, दक्षिन बहुरि सुजान।
धृष्ट भाखिकैं सठ कहौं, लक्षन लक्ष्य प्रमान॥6॥

अनुकूल लक्षण

परनारिन तें बिमुख जो, निज तिय एकासक्त।
सो अनुकूल बखानहीं, जे साहित अनुरक्त॥7॥

यथा (कवित्त)

होते अरबिंद से तौ आयकै मलिंद बृंद,
लेते मधुबुंद कंद तुंद के तरारे ये।
खंजन से होते तो प्रभंजन परस पाय,
उड़ते दुहूँधा तें, न रहते नियारे ये।
‘ग्वाल’ कवि मीन से, मृगन से, जो होते तो पै,
बन-बन माँहि दोऊ दौरते करारे ये।
यातें नैन मेरे खरे लोह से हैं काहे तें कि,
खेंचे लेत प्यारी चख-चुंबक तिहारे ये॥8॥
सेवी जानि मोकों लोग कासी कों पठावत हैं,
आवत न मेरे मन, कान न धरत हौं।
जंघ-कदली-बन में, नाभि-कूप कूल बैठि,
अतर-गँगोंतरी की सीसियाँ ढरत हौं।
‘ग्वाल’ कवि चंदन चढ़ाऊँ, माल पहराऊँ,
अँगुरिन आरती उतारि बिचरत हौं।
सुचिकर रुचिकर उच्च पद पाइबे कों
प्यारी कुच-सिव कों मैं पूजन करत हौं॥9॥

दक्षिण लक्षण (दोहा)

ब्याही बहु नारीन में, राखत नेह समान।
दक्षिन पति तासों कहत, दक्ष सबै गुनवान॥10॥

यथा (कवित्त)

नारद को संसय प्रकास्यो कान्ह एक ह्वैकै,
कैसे बहु बालन के तोस कों ढल्यो करै।
सोलह हजार एक सात-आठ महलों में,
याही हेत क्रम करि जाय निकल्यो करै।
‘ग्वाल’ कवि वही स्यामसुंदर सबनि पास,
वही प्यार-भूषन-बिनोद उछल्यो करै।
चितै-चितै चरित चितै में चौंकि-चौंकि करि,
चकित भये से चौक-चौक में चल्यो करै॥11॥

घृष्ट पति (दोहा)

कौरि करौ अपमान तिय, तऊ डरै न सदोस।
निलज ढिठाई को सदन, धृष्ट बिना अवसोस॥12॥

यथा (कवित्त)

राति रहि जानों कहूँ, फेरि जानों घर माँहि,
मानो स्वाद घने घरनी के ललकारे के।
कैई बेर मार्यो मोहि, फूल की छरीन लै के,
मेरे तो परै न दाग छँटिया हू मारे के।
‘ग्वाल’ कवि बिहँसि जाऊँ, बलि जाऊँ, ना लजाऊँ,
भूलि जाऊँ भाव सब बाहिर निकारे के।
गुन ये हमारे भारे, जानैं उर धारे प्यारे,
तानै मजा मारे परनारि प्रेम पारे के॥13॥

शठ पति (दोहा)

मिष्ट-मिष्ट बोलै बचन, कपट करन परबीन।
सो सठ नायक जानिये, भाखत सुकबि कुलीन॥14॥

यथा (कवित्त)

क्यों न हँसि बोलौं प्यारी, खोलौ जो भयो है दुख,
देखि रुख रूखौ सौ मैं तो अनुमान्यो रहौं।
गनपति-पद को लगायो मैं सिंदूर भाल,
काहू बाल के न नैन-बान सों हन्यो कहौं।
‘ग्वाल’ कवि अधरन अंजन-मिसी के दाग,
सिरफ तिहारे अनुराग में सन्यो रहौं।
तो दृग के मेरे दृग चेरे, तोहि रहैं घेरे,
तेरे मुख-चंद को चकोर मैं बन्यो रहौ॥15॥

गुणानुसार पति (दोहा)

आपि जु उत्तम जानिये, दूजौ मध्यम होय।
अधम होत पुनि तीसरो, लक्षन-लक्ष्य सु जोय॥16॥

उत्तम लक्षण

कोपिन कामिन जानिकै, खुसी करै बहु चित्त।
उत्तम पुनि ताकों कहत, कविता माँहि सु नित्त॥17॥

यथा (कवित्त)

ताकिकै तरेरौ त्योर, प्यारी कों पिया ने कही,
कैसे कछु कोपे से किये हैं दृग हाल के।
काहू ने खिजैबे कों सुनाई होगी झूठी बात,
यातों काहू कहे होंगे तोसों बाक साल के।
‘ग्वाल’ कवि रानी कहि पाइत पलोरी गयो,
पंकज तें पाँय सहराय हांस चाल के।
मदन जग्यो उताल, बाल भई लाल माल,
लाल ह्वै खुसाल भये भाल रूप बाल के॥18॥

मध्यम पति लक्षण (दोहा)

मानवती की चेसटा, देखि करै वह पीय।
तियै दिखाइ बुलावई, मध्यम पति बरनीय॥19॥

यथा (कवित्त)

नारि कों निहारि अनमनी नाह नागर ने,
धारि लिये बसन जनाने बड़ी त्यारी के।
पायजेब किंकिनी पछेली छंद बराहरा,
अंजनादि सब ही सिँगार सजे नारी के।
‘ग्वाल’ कवि वह यह कौतुक बिलोकि बोली,
अंग तो बनै न सब नई सुकुमारी के।
कासों जलैहों कंचुकी कों कहि मुसिकानी (यूँ),
लालहू विहँसि कुच गहे प्रान प्यारी के॥20॥

अधम पति लक्षण (दोहा)

केलि समै समुझै नहीं, रहित होय भय-लाज।
अधम जु पति वह भाखिये, भाखत सुकवि समाज॥21॥

यथा (कवित्त)

आली नाह मेरो सो न काहू को बनैयो बिधि,
मोहि हमराह को उछाह भयो सपनो।
दिनभर खेलै जुआ, जेठ जू लर्यो ही करै,
दूजो दुख सासुल के पास खोलै लपनो।
‘ग्वाल’ कवि छाती मलि-मलि लाल करि डारै,
रहौं मैं उनीदी, जाम-जाम भयो तपनी।
सोऊँ मैं न जौं लों तौं लों सोवत रहत आप
सोवत ही मेरे मनभयो करै अपनो॥22॥

उपपति लक्षण (दोहा)

परतिय में अनुरक्त जो, लखै न कुल आचार।
उपपति ताकों उचरिहीं, साहित-ग्रंथ मँझार॥23॥

यथा (कवित्त)

का तू निज नारि के गुनों में गरजा है मीत,
मेरे मति मंजु तें मजा है बेसम्हारी में।
तजा है सकल सुख, जग आइबे कों तैने,
बार-बार मो पै तो कह्यौ न जाह यारी में।
‘ग्वाल’ कवि प्रेम की धजा है धरती में यही,
बजा है नगारा मैन-फौज की अगारी में।
देव की रजा है, रूप रहत सजा है सदा,
अजब मजा है रे, मजा है पर नारी में॥24॥

वैशिक (दोहा)

गनिका ही में आसकत, धन दै-दै बिलसात।
सो बैसिक नायक कहैं, रसग्रंथन बरनात॥25॥
बैसिकहू बिधि तीन हैं, उत्तम मध्यम जान।
अधम तीसरो भाखियत, चातुर लेत पिछान॥26॥

उत्तम वैशिक

गनिका रूँसी जानिकै, धन-मन-मान जु देइ।
हर बिधि ताहि मनावई, बैसिक उत्तम भेइ॥27॥

यथा (कवित्त)

नैकों अनमनी मोहि नागर निहारै कभूँ,
वारि-वारि डारै प्रान प्रेम के पसारे सों।
उदित उदार रिझबार रीझै बार-बार,
आदर अपार करै, दीनभाव भारे सों।
‘ग्वाल’ कवि तन-मन करै मेरे अरपन,
धन अनगन देत, तनक इसारे सों।
चाहै चंपकली लेऊँ, चाहै चंदहार लेऊँ,
चाहै लेऊँ चौलरी चमकदार प्यारे सों॥28॥

अधम वैशिक (दोहा)

प्रगट करै नहिँ आपनो, तिय सों क्रोध सप्रेम।
तिय हिय भाव गहै सफल, मध्यम बैसिक छेम॥29॥

यथा (कवित्त)

बिभव कसन में न कसन तिहारै कछु,
एक ही ब्यसन खोटो लीयो उर धार है।
मेरे सब भाव तू (तो) पूछि लेत दाब-दाब,
मोहि न दुराव आवै, रहौं इकतार है।
‘ग्वाल’ कवि आपनो जतावन कों कोप प्रेम,
भलो लियो नेम जो कि छलको अगार है।
प्यार में न परदा, जो परदा तो प्यार कहा,
प्यारे बिन परदा को प्यार, सोई प्यार है॥30॥

अधम वैशिक (दोहा)

निलज अभय निरदय महा, केलि विषै दुखदाइ।
दुखवै तिय चित वित-सुबल, बैसिक अधम कहाइ॥31॥

यथा (कवित्त)

भलो मीत मोकों री तलास करि राख्यो बीबी,
दीबी दै जवाहिर की, आवत बराती सो।
पिछले ही पहर जगावै केलि बिरचावै,
गावै औ बजावै मोहि लागत अराती सो।
‘ग्वाल’ कवि कहै डर मार को न मानै कछू,
दई ललकार तो, हँसत खुरापाती सो।
ऐसी मलै छाती, जो पिराती रहै दिन-राती,
अधरा को घाती भयो रहतु है काती सो॥32॥

नायक त्रिधा (चौपाई)

इंद्रादिक कों दिव्य सु जानौं। माधवादि पुनि अदिब बखानौं।
दिव्यादिव्य नरादि प्रमानौ। इहि बिधि नायक अंसित जानौं॥33॥

(दोहा)

नाकय में त्रय और हैं, मानी चतुर सु फेर।
प्रोषित तीजौ भेद है, बहु ग्रंथन में हेर॥34॥
मानी पति ही के विषै, वाके रहे जु दोइ।
सो पति आदि तिहूँन में, बरनन उचित जु होइ॥35॥

मानी नायक

बिपरीतादिक के निमित, या जिद बढ़ै सु खेल।
इन हेतुन तें नायक जु, रूँसि रहै बिन झेल॥36॥

यथा (कवित्त)

गौने कों न बीत्यो मास, वह का रिझाइ जानै,
तन न सजाय जानै, जानै खेल खाइबो।
तासों बिपरीत कों तू रूँस्यो भल्यो स्यान जानै,
वह न रुँसाइ जानै, जानै ना मनाइबो।
‘ग्वाल’ कवि अब ही न बात बिरचाय जानै,
सिरफ लजाय जानै, जानै न हँसाइबो।
बाँसुरी ही सिरफ बजाय जानै तू तो लाल,
जानै कहा हाल, नई बाल कों पत्याइबो॥37॥

चतुर नायक (दोहा)

चातुरता को सदन जो, चतुर सु द्वै परकार।
वाक्य चतुरई होत है, क्रिया चतुर पुनि धार॥38॥
वाक्य चतुर जो पति विषै, सो सठ अंतर जान।
क्योंकि सठ जु नर होत है, चातुरता की खान॥39॥

क्रियाचतुर यथा (कवित्त)

राजत ही सब गुरु-नार पाकसाला माँहि,
तहाँ हौं तमासो ताक्यो करौं सो उचार में।
कोऊ करै नीर सीरो सोरा में चलाय करि,
कोऊ करै बीजना कलित फूलहार में।
‘ग्वाल’ कवि लाल निज बाल कों तकाय करि,
जेंवत में कीयो इक ख्याल सुख-सार में।
फूल बंधुजीव को प्रथम धरि बीचों-बीच,
बहुरि उसीर धर्यो भोजन के थाल में॥40॥

उपपति वाक्य चतुर, यथा

ऐसो एक संग प्यारे जोग सो जुर्यो है आइ,
करौं का उपाइ भाल लिखी लहनी परी।
माँदगी पिता की सुनि, माइ माइकैं कों गई,
धरनी हू साथ गई, यहू सहनी परी।
‘ग्वाल’ कवि भावज के भैया की सु भाँवरै ही,
वहू गई भोर ऐसी विथा गहनी परी।
तात गये जात अरु भ्रातें बरात गये
रात पाँच-सात इकले ही रहनी परी॥41॥

उपपति क्रिया चतुर, यथा

मन की मिलापिन परोसिन तकत तकि,
गेह लिखि बिंदु दे, तकायो ताहि ब्रजराउ।
बूझि यह मरम सु मीत सों मिली है आय,
करन लगे री दुहूँ मैन के मजे के भाउ।
‘ग्वाल’ कवि रँगी रति करिहौं लै तोर्यो हार,
दाने गये फैल, भयो नवला कों घबराउ।
बोल्यो छैल छली, करौ जलदी न जाइबे की,
मैं तौ दऊँ बीन, तुम मुकता गनत जाउ॥42॥

प्रोषित पति (दोहा)

पर-पुर आपुन जाय या, नारी पीहर जाय।
तब ता बिन नर व्याकुलै, सो प्रोषितपति गाय॥43॥

यथा (कवित्त)

जा दिन तें आयो मैं बिदेस कों नरेस पास,
ता दिन तें बारै है बिरह सुकुमारी को।
देखों जब चंद, तब बदन अमंद वाको,
दीख परै बृंद सो अमल उजियारी को।
‘ग्वाल’ कवि मिसरी तें, कंद तें, अँगूरन तें,
आवत है याद वाको बचन हुस्यारी को।
चौमुखा चिराक-सी चहूँधा चमकन चारु,
चामीकर चंपक सो तन मेरी प्यारी को॥44॥
रंगन की मेल तेल गरम समान लागै,
खेल की खिलाई सेल रेल की खगत है।
फूलन की माल हाल ब्याल-सी बिहाल करै,
सौरभ जहर की जहर उमगत है।
‘ग्वाल’ कवि गहर गुलालन की लाल मूँठ,
मूँठ सी लगत उर दागन दगत है।
नबल किसोरी चितचोरी चौंप बोरी ऐसी,
गोरी बिन होरी अंग होरी-सी लगत है॥45॥
साँपनि-सी लागै सेज मंजुल मजेजदार,
आँख न लगत कभूँ आँख कजरारी बिन।
करत दुसालें हियरा में ये दुसालैं आहि,
होत नटसालैं चित्रसालैं धीर भारी बिन।
‘ग्वाल’ कवि का पै सही जाय बिरहा की पीर,
तीर भये तातें उपचार हुसियारी बिन।
सालै सेल झेल-सी संतापिन सिसिर हाय,
कौन या बिदेस में बचावै प्रानप्यारी बिन॥46॥

(सवैया)

हारन में हरियाली भई, हरियालो हिंडोलना हालिकें ही हरै।
जामिनि में जुगनू की जमात, जरावत जोय जगी जिंदगी हरै।
त्यों कवि ‘ग्वाल’ धनी धनी वे, जिनकी धनधाम वियोग गनी हरै।
पीहरै पाहुनी प्यारी गई, अब प्यारे पठाइयै पेलि पपिहरै॥47॥

प्रोषित उपपति (दोहा)

पीहर सासुरै तिय गवन, उलट-पुलट लखि लेउ।
यासु जाय परपुर दुखै, उपपति प्रोषित भेउ॥48॥

यथा (सवैया)

जा दिन तें ससुरारि गई, चितदोहनी सोहनी मोहनी मेरी।
ता दिन तें न सुहात कछू, न बिहात है रात, बिथा बहु घेरी।
तू अलि जा कवि ‘ग्वाल’ कहै, करि मो पै दया हहा खाऊँ मैं तेरी।
कंत इकंत को तो बिन अंत, सो यों कहि आउ इकंत मे एरी॥49॥

(कवित्त)

आयो मैं बिदेस तजि प्यारी छबि प्रीत वारी,
अमल अगर ये अँगार भये जात हैं।
चंदन औ’ चंद्रक गुलाब का लगाऊँ प्यारे,
फूलन के हार हर-हार भये जात हैं।
‘ग्वाल’ कवि कहै तहखाने कहा खसखाने,
येऊ दुखदाई इकतार भये जात हैं।
कैसें धरौं धीर, मेरे उर में गँभीर पीर,
पंचतीर वारे तीर पार भये जात हैं॥50॥

प्रोषित वैशिक लक्षण (दोहा)

आप जाय परदेस कों, अथवा गनिका जाय।
ता बिन ब्याकुल होय सो, प्रोषित बैसिक गाय॥51॥

यथा (कवित्त)

दीनी मोहि आयस बिदेस आइबे की जब,
कीन्हीं फरमाइस जो करि मुसिकानि कों।
सो न वह भूलै अदा, अजय अनूप वाकी,
सूलै भई रहत, सदाई मेरे प्रान कों।
‘ग्वाल’ कवि कैसी-कैसी केलि में करै है कला,
जिलह चढ़ायो करै कोक की कलान कों।
कब वा सुजान कों, भुजान कों मिलाइहौं मैं,
सुनि-सुनि तान कों दऊँगी मुकतान कों॥52॥

(दोहा)

बिरह दसा दस जे कहीं, ते तिहुँ प्रोषित माँहि।
लक्षन वे ही सबन के, यातें फिरि न लिखाँहि॥53॥

अनभिज्ञ नायक

नायक को आभास सो, और एक बरनाइ।
अनभिज्ञ सु नाम तिहिँ, भिज्ञ लिखत सब कोइ॥54॥
अतिमूरख, जानै नहीं, केलिकला की रीति।
नागरीन कों दुखद अति, सो अनभिज्ञ कुनीति॥55॥

यथा (कवित्त)

बूझन न नैकों कहै बातन की घातन कों,
रातन कों सोयो करै, खिनहू खिलै नहीं।
हाव कों न जानै कछू, भाव कों न जानै दैय्या,
चाउ कों न जानै, काहू दाव तें किलै नहीं।
‘ग्वाल’ कवि कहै काम काम को तो होत ही है,
पै न खुसी होत ही है, रीझत दिलै नहीं।
नूर औ’ सहूर सब धूर होत जाय आली,
राम करै कूर पति काहूँ कों मिलै नहीं॥56॥

सखा लक्षण (दोहा)

नायक की जु प्रसन्नता, ताकों कारन रूप।
पास रहै विस्वासमय, कहि सो सखा अनूप॥57॥
चौ बिधि सखा बखानिये, पीठमर्द इक होत।
बिट अरु चेटक बिदूषक, यों करि नाम उदोत॥58॥

पीठमर्द लक्षण

नायिका जु है मानिनी, ताकों करै प्रसन्न।
मान-मुचावन बिध बिबिध, पीठमर्द संपन्न॥59॥

यथा (कवित्त)

स्याम ने मनाइबे कों भेज्यो सखा स्यामा पास,
बोल्यो जाइ आप रिस कासों करि लीनी है।
प्रीतम तिहारेा तो तिहारेई अधीन रहै,
लीन रहै राबरे ही रूप, मति भीनी है।
‘ग्वाल’ कवि नारिन निहारिबे की बात कहा,
नगी औ’ परीन हू कों जानत मलीनी है।
ऐसै करीं राजी जो बिरागी ह्वै बिराजी हुतीं,
चातुरी की साजी सों तुरंत बस कीनी हैं॥60॥

विट लक्षण (दोहा)

मदन तंत्र बहु भाँति के, अरु बहुमंत्र अनेक।
नायक कों जु सिखावई, सो बिट सखा सविवेक॥61॥

यथा (कवित्त)

जो पै तुम चाहत हौं, केलिकला कौतूहल,
तो पै मैं सिखाऊँ प्यारे भेद पूरे प्यार को।
कोक की कलान करि कीजे बनितान बस,
सीखिये उदीपन अनंग के प्रकार को।
‘ग्वाल’ कवि आसन सिखाऊँ असी-चार चारु,
गोली अवलेहति लावहु तव हार को।
सिखै दऊँ जुगति, जमाऊँ जोर घनो रहै
बनौ रहै रंग में रुकाउ बड़ी पार को॥62॥

चेटक लक्षण (दोहा)

नायक हित की नायका, तिहिँ मेलन परबीन।
सो उह चेट सखा जु है, बरनत रस रंगीन॥63॥

यथा (कवित्त)

कंबु कल ग्रीवा औ’ सुदरसन बेस रहै,
गदा बाहु पै लिये पदम पद लाला उह।
नारायन गौर अंग, सिव कुच ध्यानी संग,
सुधाधर नाभि नीकै रहत रसाला उह।
‘ग्वाल’ कवि सुबरन मंदिर रजत रूप,
चंचला सों चपलाई, बिदित बिसाला उह।
तप-जप-जाग करै वेद भाग मिलै भैया,
अति सुखदैया श्रीवेकुंठ बेस वाला वह॥64॥

विदूषक लक्षण (दोहा)

हांस हेत उह जानिये, रचै रूप बहु भाव।
सखा बिदूषक तिय पियै, हर बिधि देइ हँसाय॥65॥

यथा (कवित्त)

कापै सिखवायो याहि लाल तुम छलबल,
बदल-बदल सुर कारक अलाप को।
अंगन उचावै औ’ लचावै, हांस बिरचावै,
दृगन नचावै, हरवैया मन-ताप को।
‘ग्वाल’ कवि कहै कभूँ केसी-कंस-कोल बनै,
कुंभज कभूँ बनै, करैया क्रिया श्राप को।
तुम तो त्रिभंगी बने, कभूँ और जंगी बने,
ऐसो बहुरंगी अंगी, संगी यह आपको॥66॥

शृंगार रस: उद्दीपन वर्णन (दोहा)

चारु चाँदनी चंद्रमा, घन बिजुरी अरु मेह।
कोयल को किल चात्र गज, मोरादिक सुभ गेह॥67॥
चंदनादि सौरभ सकल, त्रिबिधि समीर इकंत।
बाग राग नृत चित्र सर, षट्रितु सुख सरसंत॥68॥
इन्हें आदि औरों बहुत, सुंदर बस्तु समग्र।
तातें षट्रितु कहत हों, आवै सब सुख अग्र॥69॥

षट्ऋतु कथन

प्रथम बसंत बखानिये, ग्रीषम पावस फेर।
सरद हिमंत जु सिसिर कहि, ये हैं षट्रितु हेर॥70॥

वसन्त

मीन-मेष संकांत में, पतझर पिक कूकंत।
त्रिभुवन के सु कुसुम कहि, फुलै गुलाब बसंत॥71॥

(कवित्त)

बाग बन दब्बे दब्बे फबति अनेकन सों,
सरसों-प्रसून पुखराज दरसायो है।
मोतिये सु मोतिये हैं सेवती सरस हीरे,
ठौर-ठौर बौर झौर पन्नन को लायो है।
‘ग्वाल’ कवि कहत कुसुंभ मंजु मानिक है,
सौरभ पसार पुंज पानिप सुहायो है।
सोभ सिरताज ब्रजराज महाराज आज,
रितुराज जौहरी जवाहिर लै आयो है॥72॥
सरसों के खेत की बिसायत बसंत बनी,
तामें खड़ी चाँदनी बसंती रति-कंत की।
सोने के पलँग पर बसन बसंती साज,
सोनजुही मालैं हालैं हिय हुलसंत की।
‘ग्वाल’ कवि प्यारो पुखराजन को प्यालो पूर-
प्यावत प्रिया कों, करै बात बिलसंत की।
राग में बसंत, बाग-बाग में बसंत, फूल्यो-
लाग में बसंत, क्या बहार है बसंत की॥73॥
अलिन के झुंड तें बितुंड झूमैं ठौर-ठौर,
पवन-तुरंग रंग-रंग के गवन साज।
ललित कुसुंभ रथ कोकिल पियादे जादे,
मैन फौजदार भर्यो ओज मौज सिरताज।
‘ग्वाल’ कवि कहै बेस बागन के थारन में,
गहके गुलाब धरे रतन-प्रभा समाज।
आयो रितुराज तेरे डेरन नज़र लै कै
लीजे आज जदुराज ब्रजराज महाराज॥74॥
फूलि रही सरसों सरस खेत-खेत माँहि,
अखिल अखारन को पुंज सो सुहायो है।
किंसुक कुसुम मंजु मुगदर मौजदार,
पवन मरोर नाल जाल सरसायो है।
‘ग्वाल’ कवि कहै डारे दल बिन लेजम हैं,
कोकिल मलिंद-बृंद पट्टन को छायो है।
बीर बलवंत प्रजकंत तू बसंत आज,
कुस्ती के दिखाइबे कों जेठी बनि आयो है॥75॥
बाजी-बाजी बिरियाँन सीतल उसन बात,
मंद-मंद तुतरात बालक सरूपियां।
जेठ की जलाका सी सलाका होय आवै कभूँ,
सौरभ सुहावै तरुनापन अनूपियां।
‘ग्वाल’ कवि कहै अंग थर-थर काँपै कभूँ,
कछू न बसाय जून चाहै भयो धूपियां।
आनंद के कंद, रामचंद के अनंद हेत,
आयो छबिवंत ह्वै बसंत बहुरूपिया॥76॥
बाजत मुरज मंजु मारुत मरोरदार,
बीन को बनाव तुंव बृंद बिलसंत है।
लालै आवाजै साजै चटक गुलाबन की,
सुंदर सुरंगी भौंर गुंज सरसंत है।
‘ग्वाल’ कवि कहै तार तानत अमरबेल,
साधै सुर कोकिल कुहुक हुलसंत है।
राजै महाराजै रघुबीर बीर जू के आगे,
आयो बनि बानिक कलावत बसंत है॥77॥

ग्रीष्म ऋतु (दोहा)

ग्रीषम वृष औ’ मिथुन में, रवि अति तेज उचार।
लुयें त्रषा बहु गरमि कहि, ज्वल सम तत्व जु चार॥78॥

(कवित्त)

पूरन प्रचंड मारतंड की मयूखें मंड,
जारै ब्रह्मंड अंड डारै पंख धरिये।
लूयें तन छूयें, बिन धूयें की अगिन जैसी,
चूये स्वेद बुंद-बुंद, धारें अनुसरिये।
‘ग्वाल’ कवि जेठी जेठ मास की जलाकन तें,
प्यास की सलाकन तें ऐसी चित अरिये।
कुंड पिये, कूप पिये, सर पिये, नद पिये,
सिंधु पिये, हिम पिये, पीयबोई करिये॥79॥
ग्रीषम की गजब धुकी है धूप धाम-धाम,
गरमी झुकी है जाम-जाम अति तापनी।
भीजैं खस-बीजन झुलैहैं ना सुखात स्वेद,
गात न सुहात, वात दावा सी डरापिनी।
‘ग्वाल’ कवि कहै, कोरे कुंभन तें, कूपन तें,
लै-लै जलधार बार-बर मुख थापिनी।
जब पियो, तब पियो, अब पियो, फेर अब,
पीवत हू पीवत बुझै न प्यास पापिनी॥80॥
सिंधु तें कढी है किधौं बडवा अनल अब,
दावा औ’ जठर मिल कीन्ही ताप भर की।
कैंधों महारुद्र जू के तीसरे बिलोचन की,
खुलन लगी है कहूँ कोर तेज तरकी।
‘ग्वाल’ कवि कहत सुदर्सन को म्यान कीधौं,
उधर्यो कहूँ तें टूटि सींवन है सरकी।
हाय बिरहीन की, कि लाय बिरहागिन की,
देत है जराय, जेठ धूप दुपहर की॥81॥
ग्रीषम के भान को बढ्यो है बेप्रमान तेज,
दिस-दिस दीरघ दवागि अरि गई है।
सीत भज्यो चंदन ते, चंद्रमा कपूर हू तें,
खस-बीजना हू तें, भभक भरि गई है।
‘ग्वाल’ कवि कहै फेर जल तें, कमल हू तें,
थल के सुतल हू तें, सींवा झरि गई है।
ससि कों न जानों सेत, जार दियो बार-बार,
ह्वै गयो अंगार तापै छार परि गई है॥82॥
मेष-वृष-तरनि तचाइन के त्रासन तें,
सीतलाई सब तहखानन में ढली है।
तजि तहखाने गई सर, सर तजि कंज,
कंज तजि चंदन-कपूर-पूर पली है।
‘ग्वाल’ कवि ह्वाँ तें चंद में ह्वै चाँदनी में गई,
चाँदनी तें सोरा चले जल माँहि रली है।
सोरा जल हू तें धँसी ओरा, फिर ओरा तजि,
बोराबोर ह्वै करि हिमाचल में गली है॥83॥

(सवैया)

गरमी अति धूप ने कीनी हुती, फिर लूयें चलैं, न जुझै तो जुझै।
अनुमान में आवत एक यही, अरु और कों और, सुझै तो सुझै।
कवि ‘ग्वाल’ अगस्त की सक्ति छई, यह ईसुर ही तें रुझै तो रुझै।
अवनी की नदी सब पी लई पै, नभ गंग तें प्यास बुझै तो बुझै॥84॥
पिचकारिन सों बट कों छिरक्यो, जलधारन सों जटा जागती हैं।
तिहिँ छाँह घनी में बिचोवा खसी, खस ही की कनातें सु पागती हैं।
कवि ‘ग्वाल’ वे सींची गुलाब घने, पै जलाकैं तऊ ने विरागती हैं।
न छुयें न छुयें, सियराई कहूँ, न रुकें, न रुकें लुवें लागती हैं॥85॥
चंदन की न चलाकी चलैं, फिरि चंद्रिका को कहा छीवन है।
खेमे खरे खस के छिरके, फिरके चलैं लूयें मही बन है।
यों कवि ‘ग्वाल’ परै गरमी, जऊ केवड़ा कंद को पीवन है।
ग्रीषम में जगजीवन कों, इक सीतल जीवन, जीवन है॥86॥

(कवित्त)

बरफ सिलान की बिछायत बनाय करि,
सेज संदली पै कंज-दल पाटियतु है।
गालिब गुलाब जल जाल के फुहारैं छूटैं,
खूब खसखाने पै गुलाब छाँटियतु है।
‘ग्वाल’ कवि सुंदर सुराही फेरि सोरा माँहि,
ओरा को बनाय रस प्यास डाटियतु है।
हिमकर आननी हिवाला सी हिये तें लाय,
ग्रीषम की ज्वाला के कसाला काटियतु है॥87॥
ग्रीषम के त्रास जाके पास में बिलास होंय,
खस के मवास पै गुलाब उछर्यो करै।
बिही के मुरब्बे, डब्बे चाँदी के बरक भरे,
पेठे पाक केबरे में बरफ पर्यो करै।
‘ग्वाल’ कवि चंदन चहल में कपूर पूर,
चंदन अतर तर, बसन खर्यो करै।
कंजमुखी कंजनैनी कंज के बिछौनन पै,
कंजन की पंखी करकंज सों कर्यो करै॥88॥
ग्रीषम की पीर के, विदीर के सुनो ये साज,
तरु गिरि-तीर के, सु छाया में गँभीर के।
सीतल समीर के, सुगंधी गौन धीर के जे,
सीर के करैया प्याले पूरित पटीर के।
‘ग्वाल’ कवि गोरी दृग-तीर के, तुनीर के, सु-
मोद मिलैं जैसे अकसीर के खमीर के।
आबखोरे छीर के जमाये बर्फ चीर के, सु-
बँगले उसीर के, भिजे गुलाब नीर के॥89॥

पावस ऋतु (दोहा)

पावस करक जु सिंह में, घन बिजु धुरवा भाखि।
गरज बूँद धारैं झड़ी, भान-अदीखन राखि॥90॥
दादुर चातक मोर बक, सुरधनु त्रिबिध समीर।
कबहुक झंझाहू पवन, जुगनू निसि तम भीर॥91॥
हरित भूमि विटपावली, बेलैं फुलैं फुलाइ।
कदम आदि बहु सौरभित, सुमन जु सरस फलाइ॥92॥

(कवित्त)

झूम-झूम चलत चहूँधाँ घन घूम-घूम,
लूम-लूम भूमि छ्वै-छ्वै धूम से दिखात हैं।
तूल के से पहल, पहल पर उठे आवैं,
महल-महल पर सहल सुहात हैं।
‘ग्वाल’ कवि भनत परम तम सम केते,
छम-छम-छम डारैं बूँदें दिन रात हैं।
गरज गये हैं एक, गरजन लागे देखो,
गरजत आवैं, एक गरजत जात हैं॥93॥
प्यारी आउ छात पै, निहारि नये कौतुक ये,
घन की घटा तें खाली नभ में न ठौर हैं।
टेढी सूधी गोल औ’ चखूँटी बहु कोनवारी,
खाली-लदीं खुली-मुँदी करैं दौरादार हैं।
‘ग्वाल’ कवि कारी धौरी घुमरारी घहरारी,
घुरवारी बरसारी झुकीं तौर-तौर हैं।
यह आई, वह आई, यह गई, वह गई,
और यह आई उठी, आवत ये और हैं॥94॥
रंग-रंग-रंग के पयोधर तुरंग तीखे,
मुस की सुरंग चीने सुघर समाज के।
त्रिबिध बयार सों सवार बेगबाग धार,
बीजु चमकार तोप, प्याले खुस काज के।
‘ग्वाल’ कवि अंबर अनूप रूप खेमा खूब,
धुरवा तनाव तने दृढ़ता दराज के।
हेरे मैं करेरे दल, घेरे चहुँ फेरे अब,
आय परे डेरे नेरे मेघ-महाराज के॥95॥
प्यार सों पहरि पिसवाज पौंन पुरवाई,
ओढ़नी सुरंग सुरचाप चमकाई है।
जगाजोति जाहिर जवाहिर सी दामिनी है,
अमित अलापन की गरज सुनाई है।
‘ग्वाल’ कवि कहै धाम-धाम लसि नाचै-राचै,
चित्त वित्त लेत मोद माचत महाई है।
बंचनी विरागहू की, अति परपंचनी सी,
कंचनी सी आज मेघमाला बनि आई है॥96॥
पावस की साँझ माँझ तकिये तमासो खासो,
वासों कियो भानु दबी किरनें दिखात हैं।
एरी मेरी प्यारी तें निहारी हैं कि नाहीँ कभूँ,
कैसी नभ न्यारी-न्यारी छबि छहरात हैं।
‘ग्वाल’ कवि सूही सेत, चंपकई नीली पीली,
धूमरी सिँदूरी बदरी ये मँडरात हैं।
मानहु मुसब्बर मनोज को मुकब्बा मंजु,
फैलि पर्यो ताकी तसवीरें उड़ी जात हैं॥97॥
गेह अति ऊँचे होंय, खुले होंय, ढके होंय,
दरैं होय, गोखे होंय, ऐसे होंय रंगै सी।
बन होंय, बाग होंय, बीन होंय, बग होंय,
केकी होंय, भेकी होंय, पवन उमंगै सी।
‘ग्वाल’ कवि गरम गिलौरी होंय, गिजा होंय,
बूँदें होंय, दूँदें होंय, दामिनी के संगै सी।
प्यारी होंय, प्यारे होंय, प्यार होंय, प्याले होंय,
होंय परजंक पर जंघन की जंगै सी॥98॥
देख-देख आवन ये सावन सुहावन की,
ऐसी चित आवत कहूँ न नैंक टरिये।
पलंग बिछाय, आछे अतर लगाय चाय,
गायकै कलार दाय भाय अनुसरिये।
‘ग्वाल’ कवि कामिनी की जंघन में जंघ मेलि,
पेलि भुज गल में लपेट अंक धरिये।
चूमिकै कपोल गोल, उरज अमोल मलि,
खोलि-खोलि नीवी मनभायो कर्यो करिये॥99॥

(सवैया)

यह सावन आयो सुहावन है, तरसावन मान सो भागि रहौ।
जलधारन सों थल पूरि रहे, सुर मीठे मलारन रागि रहौ।
कवि ‘ग्वाल’ दया करि देखो इतै, रिस दागन सों जिन दागि रहौ।
अनुरागि रहौ, निसि जागि रहौ, रति पागि रहौ, गल लागि रहौ॥100॥
उचका-उचकी चढ़े पाट दुहूँ, गहि डोर सुरंग रचारच की।
अति फूलन झूलन में पिय ती, गति सी दिखै देत नचानच की।
कवि ‘ग्वाल’ प्रिया मुसिकात मनै, उड़ि आवनि त्यों मुख पै कच की।
लचका-लचकी मचकी न मची, महामोद मच्यो मचका-मचकी॥101॥

शरद ऋतु (दोहा)

सरद जु कन्या तुल बिषै, अंबर सरिता स्वच्छ।
सुस्क पंथ, पंथी गमन, चारु जोन्ह परतच्छ॥102॥

कवित्त

मोरन के सोरन की नैंको न मरोर रही,
घोर हू रही न घन, घने या फरद की।
अंबर अमल, सर-सरिता बिमल भल,
पंक को न अंक औ’ न उड़नि गरद की।
‘ग्वाल’ कवि चहूँधा चकोरन के चैन भये,
पंथिन की दूर भई, दूखन दरद की।
जल पर, थल पर, महल अचल पर,
चाँदी सी चमकि रही, चाँदनी सरद की॥103॥
चमचम चाँदनी की चमक चमकि रही,
राखी है उतारि करि चंद्रमा चरख तें।
अंबर-अवनि-अंबु-आलय-विटप-गिरि,
एक ही से पेखे, परैं बनैं न परख तें।
‘ग्वाल’ कवि कहै दसों दिसा ह्वै गईं सफेद,
खेद को रह्यो न भेद, फूली है हरख तें।
लीपी अबरख तें, कि टीपी पुंज पारद तें,
कैंधों दुति दीपीं चारु चाँदी के बरख तें॥104॥

हेमन्त ऋतु (दोहा)

हिम रितु वृश्चिक धन विषै, सीत सरसँई होय।
दिन-दिन, दिन लघु दीह निसि, पाला जमन सु होय॥105॥
ऊनी पसमीनी बहुरि, तूली बसन सु सेज।
तरुनी तेल तँमोल ये, होत जु अधिक मजेज॥106॥

(कवित्त)

हरषि हिमंत में इकंत कंत संग मिलि,
मौज लै अनंत, छबिवंत तेरो गात है।
रबि की मयूख सो, पियूख-सी लगत मीठी,
खेतन में ऊख की, बहार दरसात है।
‘ग्वाल’ कवि तलप तुलाई की हितान लागी,
आन लागी लगन बरफ भरी वात है।
दिन-दिन घटन लाग्यो है दिन छिन-छिन,
छिन-छिन छिनदा सरस होत जात है॥107॥
सीरे-सीरे नीर भये नदिन के तीर-तीर,
सीरे भये चीर, धरा सीरी सब परि गई।
दसहू दिगंतै दिन-रात लागी कुहरान,
पौन सरसान, सफ तीर-सी निकरि गई।
‘ग्वाल’ कवि ऐसे या हिमंत में न आये कंत,
सो तुम्हें न दोस सलतंत औरै ढरि गई।
सूखि गये फूल, भौंर-झौंर उड़ि गये, मानो-
काम की कमान की, कमान-सी उतरि गई॥108॥
सीत की सवाई-सी दिखाई परै दिन-रात,
खेतन में पात-पात, जमे जात सोरा से।
सरर-सरर बरफान की पवन आवै,
करर-करर दंत बाजैं झकझोरा से।
‘ग्वाल’ कवि कहै ऊन अंबरनि चोरैं जहाँ,
सूती बसनन तें तो बहे जात धोरा से।
जोर-जोर जंघन उदर पर धर-धर,
सिकुरि-सिकुरि नर होत हैं ककोरा से॥109॥
बाहिर गये तें घर आवन लगे हैं लोग,
घर के बसैयन पयानो कियो साफा सो।
ज्ञानिन को ज्ञान अरु ध्यानिन को ध्यान-मान,
मानिन को मान फाट्यो मृगमद नाफा से।
‘ग्वाल’ कवि कहै प्याला बाला ये दुहूँन ही में,
सबही ने जान्यो ठीक आनँद इजाफा सो।
जोमदार जीवन कों जोम को जगैया बड़ो,
आयो अब जाड़ो, जगकरन जुराफा सो॥110॥
झर-झर झाँपै, बड़े दर-दर ढाँपै, नापै,
थर-थर काँपै, तऊ बजत बतीसी जाय।
फेर पसमीनन के चौहरे गलीचन पै,
सेज मखमली सौरि सोऊ सरदी-सी जाय।
‘ग्वाल’ कवि कहै मृगमद के धुकाये धूम,
ओढ़ि-ओढ़ि छार भार, आगि हू छिपी-सी जाय।
छाकै सुरा सीसी हू न, सी-सी यों मिटैगी कभूँ,
जौं लों उकसी-सी छाती, छाती सों न मीसी जाय॥111॥
कन्या के भयो अभूत पूत मजबूत महा,
बल है अकूत, धूतपन में अर्यो रहै।
बाँध-बाँध देत है समाध उघिरे तन की,
रंकन अगाध आध-ब्याधन ढर्यो रहै।
‘ग्वाल’ कवि कहै पर धरवा अपर धर,
थर-थर काँपै, तऊ नैक न डर्यो रहै।
ऐसो सीत जबर निरखि रवि डर कर,
हरबर धाय धन-मकर पर्यो रहै॥112॥
कातिकादि चारों मास तखत बिछाय बैठ्यो,
बद्दल सजल जत्र छत्र छबि छाई है।
जब तब मेह धार चौंर चारु ढोरियत,
सुरहर पान की बजीरी सरसाई है।
‘ग्वाल’ कवि बरफ बिछायत कुहर दल,
ठिरनी प्रबल नीकी नौबत बजाई है।
सीत बादसाह सो ना दूजो कोऊ दरसाय,
पाय बादसाही बाँटै सबको रजाई है॥113॥
कासमीर कारीगर काम के कमाये भये,
कुंजदार क्यारिन के पसमीनी फरसै।
सेज मखमली पर, मेनका-सी मदभरी,
मद की मुराद भरी, मानिक सी सरसै।
‘ग्वाल’ कवि चादर संबूरी हो सरीर पर,
आतस अनंग ही की अँगन में परसै।
समै के मिले पै, खेल-खेल के खिले पै,
दिले इतने मिले पै, सीत दूरहू न दरसै॥114॥
सोने की अंगीठिन में अगिन अधूम होय,
होय धूमधार हू तो मृगमद आला की।
पौन को न गौन होय, भरक्यो सुभौन होय,
मेवन की खौन होय, डबिया मसाला की।
‘ग्वाल’ कवि कहै हूर-परी सी सुरंग वारी,
नाचती उमंग सों तरंग तान ताला की।
बाला की बहार, औ’ दुसाला की बहार आई,
पाला की बहार में बहार बड़ी प्याला की॥115॥
गाले अति अमल भरा ले तोसकों में फेर,
ऊपर गलीचे बिछवा ले जाल वाले अब।
सेजन पै सेजबंद खूब कसवाले बाले,
खाले रसवाले जे गजक बनवाले सब।
‘ग्वाल’ कवि प्यारी कों लगाले लिपटाले अंक,
सोयकै दुसाले में मजा ले अति आले अब।
मंजुल मसाले मिले, सुरा के रसाले पियें,
प्याले पर प्याले, मिटैं पाले के कसाले तब॥116॥
बारियाँ महल की न हलकी मुँदी हैं जहाँ,
रास परमल की, अँगीठियाँ अनल की।
जोतें मैन झलकी, चंगेरैं हैं नुकल की, सु-
प्यालियाँ अमल की, पलंगैं मखमल की।
‘ग्वाल’ कवि थल की सची-सी लंक बल की,
वो फूल सम हलकी, प्रभा में झलाझल की।
बिपरीत ललकी, कहै वो बात कल की, सु-
बाले छबि छलकी, दुसाले में उछल की॥117॥

शिशिर ऋतु (दोहा)

सिसिर मकर औ’ कुंभ में, दिन कछु-कछु बढ़वार।
घटन कुंभ तें सीत को, खेलत फाग खिलार॥118॥

(कवित्त)

रैनि घटि-घटि कै बढ़न लगो दिनमान,
लागी है किरन गरमान भान संग की।
सीरी-सीरी पवन हिलान लागी कबहुँक,
धीरी-धीरी आवन सुगंध हर रंग की।
‘ग्वाल’ कवि कहै ठंड साँझ तें सवारे लग,
उठत तरंग तामें मदन उमंग की।
सिसिर में सीत की लगी है होंन डगमग,
मग-मग होंन लागी जगमग रंग की॥119॥

(सवैया)

फूलि रही सरसों चहुँ ओर, ज्यों सोने के बेस बिछायत साँचें।
चीर सजे नर-नारिन पीत, बढ़ी रसरीति, बरंगना नाँचें।
त्यों कवि ‘ग्वाल’ रसाल के बौरन, भौंरन-झौंरन ऊधम माँचें।
काम गुरु भयो, फाग सुरु भयो, खेलियें आज बसंत की पाँचें॥120॥

फाग में होली वर्णन (कवित्त)

फाग में, कि बाग में, कि भाग में रही है भरि,
राग में, कि लाग में, कि सोहैं खात झूठी में।
चोरी में, कि जोरी में, कि रोरी में, कि मोरी में,
कि झूमि झुकझोरी में, कि झोरिन की ऊठी में।
‘ग्वाल’ कवि नैन में, कि सैन में, कि बैन में,
कि रंग लेन-देन में, कि ऊजरी अँगूठी में।
मूठी में, गुलाल में, कि ख्याल में तिहारे प्यारी,
का में भरी मोहिनी, सो भयो लाल मूँठी में॥121॥
आई एक ओर तें, अलीन लै किसोरी गोरी,
आयौ एक ओर तें किसोर बाम हाल पै।
भाजि चल्यो छैल छरौ, छोर पै छबीलिन नें,
छरी कों उठाय धाय, मारी उर-माल पै।
‘ग्वाल’ कवि हो-हो कहि, चोर कहि, चेरो कहि,
बीच में नचायो, थेई-तत-थेई ताल पै।
ताल पै, तामल पै, गुलाल उड़ि छायो ऐसो,
भयो एक और नंदलाल, नंदलाल पै॥122॥
मोहन औ’ मोहिनी नें फाग की मचाई लाग,
बाग में बजत बाजे, कौतुक बिसाल है।
केसर के रंग बहैं, छज्जन पै, छातन पै,
नारे पै, नदी पै औ’ निकास पै उछाल है।
‘ग्वाल’ कवि कुंकुम की घालन रसालन पै,
तालन-तमालन पै, फूटत उताल है।
गुंजन गुलाबन पै, लालन पै, ग्वालन पै,
बाला-बाल-बालन पै, घुमड्यो गुलाल है॥123॥
जो पै बेगुनाही तो गुनाही सदा रावरो में,
आपै जो गुनाही, जो न खेलौ खेल घूमकै।
होत हुरआइन लुगाइन की कूकैं भलैं,
पिचकी अचूकैं चलैं, बूकैं लूम-लूम कै।
‘ग्वाल’ कवि कैसो लाल, लायो है गुलाल हाल,
पाऊँ जो हुकुम तो लगाऊँ भाल भूम कै।
झूमकै जडाऊ, झूम-झूमकैं झपाकि हाय,
लेत वे कपोल गोल गोरे चूम-चूम कै॥124॥
आइकै री राधिका, जमाइकै जुवति-जूथ,
फगुवा मचाइकै, खड़ी ही छबि छाइकै।
जाइकै तहाँई मैं हू फस्यो वे उपाइकै री,
घाघरो पन्हाइकै लयो री मैं नचाइकै।
गाइकै सुकवि ‘ग्वाल’ लाइकै गुलाल लाल,
हँसत हँसाइकै, मैं कुच गहे धाइकै।
नैनन लचाइकै, सु बैनन रिसाइकै, जू-
सैनन चलाइकै, गई हमें बुलाइकै॥125॥
आज नंदलाल संग, लै-लै गोप ग्वाल बाल,
खोलैं ख्याल दै-दै ताल, गावन प्रसिद्धि की।
कीरति की कुँवरि किसोरी गोरी लाखन लै,
जोरी करी होरी, होरी रास-रूप रिद्धि की।
‘ग्वाल’ कवि जुरि-जुरि, दै-दै मूँठि घुरि-घुरि,
झेलें रंग मुरि-मुरि, सीँवा नेह-निद्धि की।
केसर वही सो करै सेस के फनन पीरे,
उड़िकै गुलाल करी लाल लटें सिद्धि की॥126॥

(सवैया)

बालम तेरो न मानें कह्यो, करै जंत्र औ’ मंत्र घने’ब रुठी में।
पूछत या हित सों तुम सो, चित सों हहा दीजे बताय तुठी में।
त्यों कवि ‘ग्वाल’ गुलाल की वा दिन, देखी चलावन री अनुठी में।
लाल मुठी में कहा करतूत, भयो जिहिँ तें वह लाल मुठी में॥127॥
जाहि लगै सो भजै न अगै कों, गिरैइ परै, पै सकै नहिँ ऊठै।
जो कहुँ कोऊक कूदि चलै तो, तहाँ बिचलै, जहाँ रंग अनूठैं।
त्यों कवि ‘ग्वाल’ खिलाखिल खेल में, खीजैं, खिलैं, खिन खोरि में रूठैं।
मूठें गुलाल की, बाल की यों चलैं, ज्यों चलैं मंत्र बिसाल की मूँठैं॥128॥
आवत ही ब्रजनारी जहाँ, पिचकारी बिहारी चलाई उताल मंे।
दौरिकै एक अचानक अंगना, लै गई पीत पिछौरिया हाल में।
ढूँढि थके कवि ‘ग्वाल’ गुपाल, न पाई कहूँ वह राति के ख्याल में।
दै गुलचा वही बाल मसाल सी, जाय मिलै है मसाल की माल में॥129॥
फाग में फैल करी मिल ग्वालन, छैल बिसाल रसालन ऊपर।
लाल की लाल मुठी को गुलाल, पर्यो उड़ि बाल के बालन ऊपर।
यों कवि ‘ग्वाल’ करै उपमा, सुखमा रही छाय सु ख्यालन ऊपर।
पंख पसारि सुरंग सुवा उड्यो, डोलै तमाल की डालन ऊपर॥130॥
फाग में राग की लागि दिली, खिली आँख मिलामिली प्रानन वारैं।
बाल के ओछे उरोज ऊपर, लाल छई पिचकारी की धारैं।
तेऊ चढ़ी कवि ‘ग्वाल’ तबै, तिहि की सुखमा उपमा जु उचारैं।
मानों उतंग उमंग भरे सु, छुटैं इकरंग फुहारैं हजारैं॥131॥
सुंदरी आवै अगारी चली, भलीभाँति अदायें बतावत है।
श्री नँदलाल चलावत कुंकुम, सूधे सफा सरसावत है।
ले लगे ऊँचे उरोजन पै, कवि ‘ग्वाल’ प्रभा दरसावत है।
हांस के हेतहिँ कुंभन पै, मनो मैन गुलेल चलावत है॥132॥

(कवित्त)

कढ्यो नंद गाम तें नबल नंदनंद आज,
फागुन समाजन के साज सब सजिकै।
गैल-गैल ग्वालिन की, ऐल सी मची है तहाँ,
छैल बकैं ऐल-फैल, वेऊ हँसैं लजिकै।
‘ग्वाल’ कवि केतिन के कुच पिचकारी मारि,
मुख मुरकाय कर्यो ख्याल एक बजिकै।
एक की सु आँखिन में भरिकै गुलाल लाल,
बाल दूजी के कपोल चूमि चले भजिकै॥133॥
फागुन की फैल के गवैल औ’ डफैल लै-लै,
बंसी के बजैल छैल, कीन्ही घनघोरी है।
लै कै पिचकारी एक नारी कों चलाई चारु,
वानें पिचकारी गहि ऐंची निज ओरी है।
‘ग्वाल’ कवि लाल तब ख्याल कों हिलाये हाथ,
परी-सी, परी है गिर, आपहू परी री है।
हँसि उठि गोरी, डारै रोरी, भरि झोरी जोरी,
जुरी आज कहैं सब, साँची यह होरी है॥134॥

॥इति श्री रसरंगे ग्वालकवि विरचिते नायकसखाउद्दीपनऋतुवर्णनं नाम सप्तमो उमंगः॥