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सफ़ीना वो कभी शायान-ए-साहिल हो नहीं सकता / शमीम जयपुरी

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सफ़ीना वो कभी शायान-ए-साहिल हो नहीं सकता
जो हर तूफ़ाँ से टकराने के क़ाबिल हो नहीं सकता

गुज़र जाए जो आदाब-ए-जुनूँ से तेरी महफ़िल में
वो दीवाना तिरी महफ़िल के क़ाबिल हो नहीं सकता

हवादिस के थपेड़ों से उलझ तूफ़ाँ से टकरा जा
कि ग़म जब तक न हो इंसान कामिल हो नहीं सकता

मुझे तुग़्यानियों से खेलना आता है हँस हँस कर
मिरा अज़्म-ए-जवाँ ममनून-ए-साहिल हो नहीं सकता

‘शमीम’ इस दौर का ये संग-दिल इंसाँ अरे तौबा
कि जिस से एहतिराम-ए-शीशा-ए-दिल हो नहीं सकता