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सब्र / कर्मानंद आर्य

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वे भूखे, सताये और मजलूम लोग
जो यातना गृहों के शिविरों से निकल कर आये हैं
हत्यारे उनका लोकतंत्र छीन सकते हैं
उनके होंठों की हंसी नहीं
वे हाथ काट सकते हैं
हौसला नहीं
वे जीभ कुतर सकते हैं
बोलने की ताकत नहीं
वे हांडियों में गोबर डाल सकते हैं
भूखा रहने का आत्मविश्वास नहीं छीन सकते
इसलिए मेरे दोस्त!
जाकर हिटलर से कह दो
यह बीजों के उगने का समय है
पहाड़ों की बरफ पिघल रही है
बछड़े फुर्री मार रहे हैं
आग
एक चूल्हे से दूसरे चूल्हे की ओर जा रही है
हिंसक उन्माद और तमाम अत्याचार
धुँआ बन चुका है
दुनिया में लोकतंत्र मर सकता है
राजतन्त्र की हत्या हो सकती है
पर वह फूल जिन्दा रहेगा
जो खिलकर सबको सुख देता है
वह घड़ी जिन्दा रहेगी
जो तमाम वक्तों की गवाह है
वे मजलूम और भूखे लोग
जो यातना गृहों से निकलकर आये हैं
हमेशा जिन्दा रहेगे
प्रेम करने वाले
सीरी-फरहाद, आसिफ़-जुलेखा, लैला-मजनू
आज तक जिन्दा हैं
क्या आप उनके हत्यारों का नाम बता सकते हैं
सताये और मजलूम लोगों से पूछिये
उनके होंठों पर सब्र लिखा है
लोकतंत्र की हत्या नहीं
हत्यारे उनका लोकतंत्र छीन सकते हैं
उनके होंठों की हंसी नहीं