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सभ्यता नई भाषा सीख रही / बालस्वरूप राही

Kavita Kosh से
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शब्द जो तिरस्कृत हैं
अर्थ जो बहिष्कृत हैं
लाओ, हम उन्हें नये गीतों में ढाल दें।

मय जब बदलता है
मोम ही नहीं केवल
लौह भी पिघलता है।

हमको क्या लेना है परदेशी केसर से
बूढ़े हिमपात से
सड़ते तालाबों में खिले हुए बासी जलजात से
हमको तो लिखने हैं गीत नये
पिघले इस्पात से।

सदियों की मैली है दूषित है
चांदनी
पीने से पूर्वं इसे
लाओ, हम छानकर उबाल दें।

जीवन था काव्य कभी
आज मगर गद्य हुआ
सभ्यता नई भाषा सीख रही है
गाने के नाम पर चिढ़े हुए बच्चे सी चीख रही।
ऊपर क्या देखें हम
आसमान काला है
जितना भी जो कुछ भी है, यही उजाला है
अग्निमुखी चांद हमें परामर्श देता है
रोशनी वहीं है बस
जहां जहां क्रेटर है, ज्वाला है।

जीवन को आग नहीं ओसकण बताते जो
लाओ वे शब्द शब्दकोश से निकाल दें।

निरुद्देश्य यात्राएं भटक रहीं निर्जन में
मन में हैं श्लोक किन्तु गालियां भरी हैं
अवचेतन में
फूल और कीचड़ पर साथ-साथ सोचते
पड़ गईं दरारें हर चिंतन में।

प्रस्तुति यदि कर न सकें समाधान
लाओ, हम मुट्ठी भर प्रश्न ही उछाल दें।