सरकश का सर गोड़ के रख देती है
परवाज़ के पर तोड़ के रख देती है
तोता-चश्मी, वो भी खास अपनों की
अहसास को झंझोड़ के रख देती है।
सरकश का सर गोड़ के रख देती है
परवाज़ के पर तोड़ के रख देती है
तोता-चश्मी, वो भी खास अपनों की
अहसास को झंझोड़ के रख देती है।