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सरकश का सर गोड़ के रख देती है / रमेश तन्हा

 
सरकश का सर गोड़ के रख देती है
परवाज़ के पर तोड़ के रख देती है
तोता-चश्मी, वो भी खास अपनों की
अहसास को झंझोड़ के रख देती है।