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साठी त मरीचिया हे परभु, एके गोट धनियाँ / अंगिका लोकगीत

   ♦   रचनाकार: अज्ञात

मसाला पीसने से पत्नी की बाँह में मोच आ जाती है। यह काफी थक जाती है और अपनी परेशानी की शिकायत पति से करती है। पति ताना देता है- ‘ऐसी बात है, तो अपने मायके से दासी बुलवा लो।’ पत्नी ने उत्तर दिया- ‘चेरी तो आई ही थी। मैंने तो एक ही चेरी को बुलाया था, लेकिन कई चेरियाँ आ गई।’ लेकिन, तुम हो, जो उन सबको जूआ में हार आये।’

साठी<ref>साठ</ref> त मरीचिया<ref>मिर्च</ref> हे परभु, एके गोट<ref>एक; एक साथ</ref> धनियाँ।
धनिया पीसैते हे परभु, मुरुछि<ref>मोच आ जाना</ref> गेल हे बहियाँ॥1॥
कहाँ केरा लोढ़िया हे सुहबे, कहाँ के सिलौटिया<ref>सिलौट</ref>।
कहाँ के पिसनहारि<ref>पीसने वाली</ref> हे सुहबे, मुरुछि गेल हे बहियाँ॥2॥
हाजीपुर के लोढ़िया हे परभु, कि पटना के हे सिलौटिया।
कवन गाँम के पिसनहरि हे परभु, मुरुछि गेल हे बहियाँ॥3॥
जब तोरा आहे सुहबे, मुरुछि गेल हे बहियाँ।
अपना नैहरबा हे सुहबे, मँगाय लेहो हे चेरिया॥4॥
एक चेरिया माँगलियै हे परभु, सहसर<ref>सहस्र</ref> चेरिया हे ऐलै।
आहे, तोहे निरबुधिया हे परभु, जुअबा हारि हे ऐला॥5॥
मैया आपन हारिता<ref>हारते</ref> हे परभु, बहिनिया हारि हे अयता।
बाबा दिहलन चेरिया हे परभु, सेहो हारि हे अयला॥6॥

शब्दार्थ
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