भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

सावन आ गइल / रामदरश मिश्र

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

घेरि-घेरि उठलि घटा घनघोर और कजरार, सावन आ गइल !
बेबसी के पार ओते, अवरु हम ए पार, सावन आ गइल !

घिरि अकासे उड़े बदरा, मेंह बरसे छाँह प्यारी ओ !!
जरत बाटी हम तरे कल, क पकड़ के बाँहि, प्यारी ओं !

लड़ति बा चिमनी घटा से, रोज धुआँधार, सावन आ गइल !!
उठति बा मन में तोहें, कजरी पुकारि-पुकारि, प्यारी ओ !

झकर-झकर मसीन लेकिन, देति बा सुर फारि, प्यारी ओ !!
रहे नइखे देति कल से, ई बेदर्द बयार, सावन आ गइल !

खेत में बदमास बदरा, लेत होइहें घेरि, प्यारी ओ !!
छेह पर लुग्गा सुखत होई, तोरे अधफेरि, प्यारी ओ !
पेट जीअत होई पापी, खाइ-खाइ उधार, सावन आ गइल !!