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सुगन्ध / शैलेन्द्र चौहान

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पानी का बुलबुला था प्यार, कब बरसा
पानी, कब बन गया बुलबुला
कैसे भरी हवा, कैसे गया फूट!
सारा खेल क्या मौसम का था?
या प्रकृति का वायुमंडलीय दबाव,
निर्वात, डिप्रेशन, किस्मत और संयोग ही
था यह, रोज भर जाती हवा,
रोज उठते बुलबुले, रोज जाते फूट
क्या सचमुच, बुलबुला ही था प्यार?

क्यों मौसम-दर-मौसम घट रहा है
वायुमंडलीय दबाव, बढ़ रहा है निर्वात
फूटते जा रहे हैं बुलबले नित्य निरंतर
बढ़ता जा रहा बुलबुलों का आकार,
फैलती जा रही है कसमसाहट
बढ़ती जा रही है टीस,
ईर्ष्या की आग फैल रही विषबेल-सी,
खत्म भी होगी अन्ततः यह प्रक्रिया,
मुरझा जायेंगे खूबसूरत मौसमी फूल।

कितने दिन होता है फूलों का जीवन भी!
अभी रच-बस गयी है सुगन्ध जो मन में
नहीं रहेगी जब, याद आयेंगे तब वे
फूल, बिखरने तक बिखेरते रहे
जो पावन-रस-भीनी सुगन्ध।