भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

सूर्य-वसंत / यतीन्द्र मिश्र

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

सूर्य अगर फूल होता

फिर पंखुड़ी होती आग

इस तरह हर फूल का

होता प्रकाश

और हर प्रकाश का

अपना रंग


ऐसे में जब-जब

जीवन में आता वसंत


हमें लगता

ढेरों सूर्य खिले हैं रंग भरे

और नाउम्मीदी की दिशा भी

उम्मीद की आग से

धधक उठी है एकबारगी।