भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

सोओ नहीं / महेन्द्र भटनागर

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज


सोओ नहीं, सोओ नहीं !

यह रात है दुख से भरी,
इस रात डूबेगी तरी,
तुम बाहुओं में शक्ति भर
कर जागते निशि भर रहो !
इंसान हो तो भीत जीवन में कभी
होओ नहीं, होओ नहीं !
:
यह रात काली है बड़ी,
पथ पर भयानकता जड़ी
तुम ज्वाल हाथों में लिए
आवाज़ यह करते रहो —
अवसर प्रलय संगर प्रबल तुम भूलकर
खोओ नहीं, खोओ नहीं !