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सोये हैं गाँव अभी से / पंख बिखरे रेत पर / कुमार रवींद्र

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दूर बहुत जाना है
पथरीले पाँव अभी से

बर्फ-ढँके जंगल में
राहें हैं बेढंगी
चुप साधे पेड़ खड़े
शाखाएँ हैं नंगी

शाम अभी होनी है
सोये हैं गाँव अभी से

ज़हरीली झील एक
पार उसे करना है
फूलों की बस्ती के
घाट पर उतरना है

थके हुए डाँड
और टूट रही नाव अभी से