भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
  काव्य मोती
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

सो जा वा रे वीर तुम तो सो जाओ वा रे वीर / बुन्देली

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

   ♦   रचनाकार: अज्ञात

सो जा वा रें वीर, तुम तो सो जाओ वा रे वीर।
बीरन की बलैयां ले गईं जमुना के तीर।।
वर पे डाले पालना, पीपल पे डारी डोर।
जो लों कन्हैंया सोवन लागे ऊपर बोली मोर।
सो लो मोरे लाड़ले, तुम जब लो होने भोर।
आवत-जावत झोंका देहों, कबहूं न टूटे डोर।
माई गई है मायके, बीरन गये ससुराल।
भैया गयें हैं चाकरी, भाभी ठांढ़ी द्वार।
ताती-ताती खीर बनाईं, जामे डारो घी।
दो कौर खा लो लाड़ले, ठण्डो पड़ जाये जी।