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स्याम! मोरी लाज तिहारे हाथ / स्वामी सनातनदेव

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राग तैलंग, तीन ताल 23.8.1974

स्याम! मोरी लाज तिहारे हाथ।
कहा कहों मेरे मनमोहन! अपनी औगुन-गाथा[1]
जानत हो सब ही मो मनकी, उरझन जो मो माथ।
साधन-अराधन बिनु हूँ मैं तरन चहों भव-पाथ॥1॥
लच्छ दूर, करनी न कहूँ कछु कहा करों अब नाथ!
सब बल सिथिल, सिथिल पौरुष हूँ, दीखत कोउ न साथ॥2॥
पै है अति हि भरोस तिहारो, तुम अनाथके नाथ।
या ही सों सब आस-त्रास तजि तकहुँ तिहारो हाथ॥3॥
सरनागतकी पत राखत हो, जगत विदित यह बात।
हौं हूँ चरन-सरन तकि आयो, क्यों त्यागहुगे नाथ!॥4॥

शब्दार्थ
  1. अवगुणों की कहानी