भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

स्वप्न सभा में प्रिय तुम आना / कविता भट्ट

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

{KKGlobal}}


 
रात्रि-प्रहर की इस स्वप्न सभा में प्रिय तुम आना
सतरंगी विश्राम- भवन से कभी नहीं जाना ।

आज तक कभी मैंने मन का द्वार नहीं उढ़काया
अहं-सांकल न चढ़ाई न ताला कभी लगाया ।

खुले झरोखे बिछे प्रेम- दरीचे सजे दर्पण
देखो सीढ़ी चढ़कर, खाली राजा का आसन ।

नवकुसुमित अधर लिये हूँ शोभा तुम्ही बढ़ाना
पदचाप रहित मंद-मंद पग-पग बढ़ते जाना ।

युग बीते प्रेम घट रीते, इन्हें भरते जाना
कभी रनिवास जीते, षोडश शृंगार सजाना ।

सप्त सुरों की ध्वनियों में गलबहियाँ पहनाना
रोम-रोम झंकृत हो ऐसा तुम साज बजाना ।

रात्रि-प्रहर की इस स्वप्न सभा में प्रिय तुम आना
 सतरंगी विश्राम- भवन से कभी नहीं जाना ।