भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

हमरा विश्वास बाटे कि हम एक दिन / मनोज भावुक

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

KKGlobal}}


हमरा विश्वास बाटे कि हम एक दिन
अपना सपना के साकार करबे करब
लाख घेरो घटा आ कुहासा मगर
बन के सूरज कबो त निकलबे करब

हर डगर बा नया, हर गली बा नया,
लोग अनजान बा, हर शहर बा नया
हौसला बा अउर, पास में बा जिगर
जहवाँ जाये के बाटे, पहुँचबे करब

पेट से सीख के केहू ना आवे कुछ,
एगो अपवाद अभिमन्यु के छोड़ दीं
सीखते-सीखते लोग सीखे इहाँ,
ठान लीं जो सीखे के तऽ सीखबे करब

पहिले मंजिल चुनीं सोच के दूर ले
राह फिर तय करीं योजना के तहत
लेके भगवान के नाम चलते रहीं
सोचते कि हम कर गुजरबे करब

बीच दरियाव में आके लौटे के का,
पीछे मुड़-मुड़ के देखे के, सोचे के का
जे भइल से भइल, जे गइल से गइल
पार उतरे के बा तऽ उतरबे करब

मौत मंदिर में, मस्जिद में, बाजार में,
मौत संसद में, घर में आ बस-कार में
तब भला मौत से डर के काहें रुकीं
मौत आई तऽ कतहूँ त मरबे करब

ई अलग बात बा आज ले सीप में
हमरा हर बेर 'भावुक' हो बालू मिलल
पर इहे सोच के अभियो डूबल हईं
एक दिन हम त मोती निकलबे करब