भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

हमारी दुनिया बहुत भिन्न है / धर्मेन्द्र चतुर्वेदी

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज


सृजन का सौंदर्य हो
या धर्म की पराकाष्ठा
न्याय,संस्कृति,साधन
बल,बुद्धि और धन
साथ में
भक्ति,ढोंग,पाखण्ड
क्रोध,शोक,रोग
वासना और निर्लज्जता
सब कुछ तुम्हारे साए में रहते हैं
हमारे पास है केवल
पसीने और कीचड़ की दुर्गन्ध

हमारे शब्द सीमित हैं
और शब्दों के मायने भी
हमारी भुजाएँ
पहाड़ काटने वाली शक्ति पाकर
बँधी रहती हैं
और हमें नहीं सिखाया जाता
इच्छाएँ करना
बल्कि हम स्वतः ही सीख जाते हैं
इच्छाओं और अभिलाषाओं का दमन करना

हमारे सपनों को खा जाते हैं
युग्मों में उड़कर आने वाले
बड़ी चोंचों वाले गिद्ध
और यदि बच भी जाएँ
तो पड़े-पड़े हो जाते हैं जंग-ग्रस्त

तुम्हारी और मेरी दुनिया
इतनी भिन्न है कि
हम अलग-अलग प्रजातियों का
प्रतिनिधित्व करते हैं

तुम्हारी दुनिया चमचमाती है
कारों में दौड़ती है
और समय से पहले बालिग़ हो जाती है
तुम्हारी दुनिया में
देशी,विदेशी संगीत की लहरियाँ हैं
मैकडोनाल्ड से लेकर
इन्टरनेट तक का
खुशहाल संसार है
तुम्हारी दुनिया को
एकरसता से मोहभंग भी हो जाता है
इसलिए
गगनचुम्बी इमारतें बनाती है
करोड़ों के जुए खेलती है
और कभी-कभी
क्लबों में फूहड़ता से नाचने भी लगती है

हमारी दुनिया
बरगद के ठूंठ किनारे बने
मटमैले छप्परों में जन्म लेती है
गँदले नालों में पलती है
और बिना बोर्नवीटा खाए वृद्ध हो जाती है
समय से पहले
हमारी दुनिया
कारखाने सिर पर उठाकर चलती है
चैत की गर्म दुपहरी में जीती है
कोयलों में पलती है
और गुमनाम होकर वहीं दफ़न हो जाती है

हमारे बदन में भरी हुई है
असहनीय दुर्गन्ध
और हमारे चेहरे पर हैं
कीचड़ के धब्बे
जिन्हें तुम हिकारत भरी नज़रों से देखा करते हो

हमारी दुनिया है
आशाओं,न्यूनताओं की दुनिया
और न्यूनताएँ देखने से
तुम्हारी आँखों को
हो जाता है मोतियाबिंद

हमारी दुनिया
संघर्षों और निर्बलताओं की दुनिया है
और निर्बलताओं के बारे में सोचने को
शायद तुम्हारा मस्तिष्क नहीं देता इजाज़त

हमारे अनेकानेक उत्पाद
जन्म के पूर्व ही तुम्हारे हो जाते हैं,
पर हमारा अन्धकार
कभी तुम्हारा नहीं हो सकता
चाहे दूधिया रौशनी के लिए फेंकी रौशनी से,
या फिर अमरत्व की रौशनी से;
यह अन्धकार रहेगा
सर्वव्यापी और सार्वकालिक
जब तक हम उड़ा नहीं देते
तुम्हारे साम्राज्य, तिनकों में|