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हमारे पास एक दिन जब / संजय कुमार सिंह

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हमारे पास
एक दिन जब केवल दुःखों की दुनिया बच जाएगी
हम सोचेंगे अपने तमाम अच्छे-बुरे विशेषणों के साथ
उनके बारे में / हमें कहना ही पड़ेगा
यह दुःख उजला था / वह काला / यह चमकीला
वह पीला भूरा / वह गहरा / वह उथला
वह कोलतार पुते रास्ते-सा / यह साथ-साथ चलता था काटता
आत्मा के पाँव जूतियाँ बनकर / यह अक्सर पीछे छूट जाता था
पथराई उम्मीदों की तरह।

वह फूल-सा / यह शूल-सा / वह बादल-सा बरस गया
यह बर्फ़-सा जम गया / वह चुभ गया कील-सा।

यह भी हो सकता है कि कोई दुःख पुराना हो / कोई नया
बिलकुल इधर का धरती से आकाश तक अटा-पटा
स्वप्न से कल्पना तक फैला-पसरा।

हमारे अनुभव से उतरेगा निर्बाध भाषा में
वह बच्चों की किताब-सा फूल जाएगा
स्मृतियों की बारिश में भींगकर
चाहकर भी हँस नहीं पाएगा
इस तरह दुःखों से भरे हमारे जीवन में
भाषा की सारी ख़ूबियाँ इसी तरह जानी जाएँगी

धीरे-धीरे गायब हो जाएँगे वे सारे शब्द
पारिजात पुष्पों की तरह
बहुत मुश्किल से याद आएँगे भूले-बिसरे भावों की तरह
कोश में इनका अर्थ काल्पनिक होगा
हमें यकीन नहीं आएगा इनके अर्थ-व्यापार पर
फिर भी जैसे-तैसे भाषा अपना काम करेगी
बचाएगी आदमी के अनुभव को सपाट होने से
कम-से-कम अपने दुःखों में फर्क कर पाएगा आदमी
लेकिन क्षमा करें रसिकगण
यह दुःख का दूसरा पाठ नहीं है
न दुःख के बारे में कोई उत्तर आधुनिक तर्क
दुःख अंततः दुःख होता है नमक के बोरे-सा गलता-गलाता हुआ
उसका दूसरा या तीसरा पाठ नहीं होता ।